चित्रकूट में भगवान राम से जुड़े स्‍थानों की जांच के निर्देश

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने पुरातत्व विभाग को निर्देश दिया है कि वह प्रदेश के सतना जिले के चित्रकूट में उन स्थानों की तीन माह में जांच करें जिनके बारे में कहा जाता है कि भगवान राम ने अपने वनवास के दौरान वहां समय बिताया था और पुरातत्व स्थल पाये जाने पर उनका संरक्षण भी किया जाए।

जबलपुर : मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने पुरातत्व विभाग को निर्देश दिया है कि वह प्रदेश के सतना जिले के चित्रकूट में उन स्थानों की तीन माह में जांच करें जिनके बारे में कहा जाता है कि भगवान राम ने अपने वनवास के दौरान वहां समय बिताया था और पुरातत्व स्थल पाये जाने पर उनका संरक्षण भी किया जाए।

मुख्य न्यायाधीश अजय मानिकराव खानविलकर एवं न्यायाधीश जेके माहेश्वरी की युगलपीठ ने इस मामले में दायर जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए सोमवार को पुरातत्व विभाग को यह निर्देश दिया। अधिवक्ता नित्यानंद मिश्रा की तरफ से दायर की गयी याचिका में कहा गया था कि प्रदेश के मुख्यमंत्री ने वर्ष 2007 में चित्रकूट में ‘राम वन गमन पथ परियोजना’ की घोषणा की थी। इस परियोजना के तहत वनवास के दौरान भगवान राम ने जिन मार्गो का उपयोग किया, उन्हें संरक्षित किया जाना था। आश्रम के समीप ही अधिकांश उक्त मार्ग है।

याचिका में कहा गया है कि इस योजना के तहत राज्य सरकार द्वारा अभी तक 8 करोड़ रुपये की राशि व्यय की गयी है। आश्रम में दो करोड़ रुपये की राशि व्यय की गयी है। वर्ष 2014 में आश्रम से 50 मीटर की दूरी पर स्थित सांवर पहाड़ में परियोजना की वजह से रोकी गयी उत्खनन की अनुमति पुन: जारी कर दी गई है। हालांकि, पुरातत्व विभाग ने बताया कि पुरातत्व की दृष्टि से यह क्षेत्र संरक्षित नहीं है।

याचिका में यह भी कहा गया कि चित्रकूट में प्रतिवर्ष तीस लाख से अधिक श्रद्धालु आते हैं। रामचरित मानस व रामायण में उल्लेख होने के कारण यह स्थल पौराणिक दृष्टि से अत्यधिक महत्वपूर्ण है। आश्रम व पहाड़ से हिन्दू समाज के लोगों की आस्था जुड़ी हुई है। याचिका में मांग की गयी थी कि इन स्थलों को पुरातत्व की दृष्टि से महत्वपूर्ण घोषित करते हुए उनका संरक्षण किया जाए।

गौरतलब है कि सरभंग आश्रम का उल्लेख रामचरित मानस और रामायण में है। मंदाकिनी नदी का उद्गम स्थल भी आश्रम के समीप है। भगवान राम ने 14 वर्ष के वनवास के दौरान 11 वर्ष का समय चित्रकूट में बिताया था।