कैलाश विजयवर्गीय ने आर्टिकल-30 के औचित्य पर उठाए सवाल, पूछा- सेक्युलर देश में इसकी क्या जरूरत?

कैलाश विजयवर्गीय ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद-30 के औचित्य पर सवालिया निशान लगाया है. भाजपा नेता ने गुरुवार को ट्वीट कर कहा है कि संविधान के अनुच्छेद-30 ने समानता के अधिकार को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया है.

कैलाश विजयवर्गीय ने आर्टिकल-30 के औचित्य पर उठाए सवाल, पूछा- सेक्युलर देश में इसकी क्या जरूरत?
भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय.

इंदौर: अक्सर अपने बयानों को लेकर चर्चा में रहने वाले भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय महा​सचिव कैलाश विजयवर्गीय ने एक बार फिर नई बहस को हवा दे दी है. कैलाश विजयवर्गीय ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद-30 के औचित्य पर सवालिया निशान लगाया है. भाजपा नेता ने गुरुवार को ट्वीट कर कहा है कि संविधान के अनुच्छेद-30 ने समानता के अधिकार को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया है.

कैलाश विजयवर्गीय ने अपने ट्वीट में लिखा, 'देश में संवैधानिक समानता के अधिकार को आर्टिकल-30 सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचा रहा है. यह अल्पसंख्यकों को धार्मिक प्रचार और धर्म शिक्षा की इजाजत देता है जो दूसरे धर्मों को हासिल नहीं है. जब हमारा देश धर्मनिरपेक्षता का हिमायती है तो इस अनुच्‍छेद की क्या जरुरत है?' 

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आपको बता दें कि भारतीय संविधान के अनुच्‍छेद-30 के तहत अल्पसंख्यकों को शैक्षणिक संस्थान संचालित करने का अधिकार प्राप्त है. संविधान का यह अनुच्‍छेद कहता है कि सरकार मदद देने में किसी भी शैक्षणिक संस्थान के खिलाफ इस आधार पर भेदभाव नहीं कर सकती है कि वह अल्पसंख्यक प्रबंधन के अधीन है.

कैलाश विजयवर्गीय के इस ट्वीट पर कांग्रेस नेता केके मिश्रा ने पलटवार किया है. केके मिश्रा ने भी ट्वीट किया, 'देश-दुनिया में कोरोना के कारण इंसान,इंसानियत खतरे में है,ऐसे में भाजपा का 'आर्टिकल 30' हटाने का प्रायोजित खेल!! 'नफ़रत के वायरस' कथित हिंदूवादियों की अल्पसंख्यकों के खिलाफ नफ़रत फ़ैलाने की कोशिश है यह! मोदी सरकार 'आर्टिकल 30' हटाने का माहौल बना रही है और यह इसकी शुरुआत है!'

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