कारगिल युद्ध में भिंड के लाल सुल्तान सिंह ने दिखाया था अदम्स साहस, अब बेटे ने कही बड़ी बात

देवेंद्र बताते हैं कि 10 जून को उनके पिता को टुकड़ी का सेक्शन कमांडर बनाया गया था. उनकी टुकड़ी को टारगेट दिया गया कि उन्हें तोलोलिंग पहाड़ी पर द्रास सेक्टर पॉइंट 4590 रॉक एरिया पर बनी चौकी को आजाद कराना था.

कारगिल युद्ध में भिंड के लाल सुल्तान सिंह ने दिखाया था अदम्स साहस, अब बेटे ने कही बड़ी बात

भिंड/प्रदीप शर्माः कारगिल की लड़ाई भारतीय इतिहास में अपना अहम स्थान रखती है. इस युद्ध के बाद भारत की सैन्य ताकत का पूरी दुनिया ने लोहा माना और 18 हजार फीट की ऊंचाई पर भारत के सैनिकों ने जिस तरह से दुश्मनों के छक्के छुड़ाए, उसने इस युद्ध के बेहद खास बना दिया. कारगिल युद्ध में 26 जुलाई को भारत की जीत की आधिकारिक घोषणा हुई थी. यही वजह है कि हर साल 26 जुलाई के दिन कारगिल शहीद दिवस मनाया जाता है. कारगिल में शहीद हुए जवानों में भिंड के भी तीन लाल थे, जिनमें से हवलदार सुल्तान सिंह एमपी के पहले शहीद थे. 

छुट्टियां छोड़कर युद्ध में हुए थे शामिल
भिंड के छोटे से गांव पीपरी में 16 जून 1960 को सुल्तान सिंह नरवरिया का जन्म हुआ था. साल 1979 में उनका चयन भारतीय सेना की द्वितीय बटालियन राजपूताना राइफल्स में हो गया था. शहीद सुल्तान सिंह का परिवार आज भी भिंड के मेहगाव में रहता है. शहीद सुल्तान सिंह के बेटे देवेंद्र नरवरिया बताते हैं कि जब कारगिल की लड़ाई छिड़ी, उस वक्त उनके पिता छुट्टियों पर घर आए हुए थे. टेलीफोन के जरिए उन्हें ड्यूटी ज्वाइन करने की सूचना मिली. जानकारी मिलते ही वह युद्ध के लिए रवाना हो गए. देवेंद्र बताते हैं कि उनके पिता को ऑपरेशन विजय का हिस्सा बनाया गया. 

जान देकर भी मिशन पूरा किया
देवेंद्र बताते हैं कि 10 जून को उनके पिता को टुकड़ी का सेक्शन कमांडर बनाया गया था. उनकी टुकड़ी को टारगेट दिया गया कि उन्हें तोलोलिंग पहाड़ी पर द्रास सेक्टर पॉइंट 4590 रॉक एरिया पर बनी चौकी को आजाद कराना था. 12-13 जून की दरमियानी रात सुल्तान सिंह अपनी टुकड़ी को लेकर माइनस डिग्री तापमान में भी पहाड़ी पर चढ़ाई करने लगे. इस बीच दुश्मन को इसकी भनक लग गई और उन्होंने मिडिल मशीन गन (एमएमजी) से गोलियां बरसानी शुरू कर दीं.  

गोलियों की परवाह ना करते हुए सुल्तान सिंह नरवरिया अपने साथियों के साथ आगे बढ़ते रहे. इस दौरान उनकी टुकड़ी के कई जवान शहीद हो गए. सुल्तान सिंह भी इस हमले में घायल हो गए थे लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और घायल होने के बावजूद ऑपरेशन को लीड किया और 8-10 दुश्मनों को ढेर करते हुए अपना टास्क पूरा किया और तोलोलिंग चोटी पर तिरंगा फहराया. हालांकि इस खुशी में शामिल होने के लिए सुल्तान सिंह नरवरिया जीवित नहीं रहे और ऑपरेशन में अपने 17 जवानों के साथ शहीद हो गए.

वीर चक्र से किया गया सम्मानित
साल 2002 में तत्कालीन राष्ट्रपति द्वारा सुल्तान सिंह नरवरिया को मरणोपरांत वीर चक्र से सम्मानित किया गया. इसके साथ ही भारत सरकार द्वारा सुल्तान सिंह के परिवार को जमीन देकर घर का निर्माण कराया और एक पेट्रोल पंप भी आवंटित किया. उसी पेट्रोल पंप से शहीद सुल्तान सिंह नरवरिया के परिवार का जीवन यापन होता है. शहीद का परिवार सरकार से मिले सम्मान से संतुष्ट है. हालांकि उन्हें इस बात की नाराजगी है कि तत्कालीन एमपी सरकार ने शहीद के परिवार के एक सदस्य को नौकरी देने का वादा किया था लेकिन अभी तक उनके परिवार के किसी सदस्य को नौकरी नहीं मिल सकी है. 

'चाहता हूं- बेटे भी सेना में शामिल हों'
देवेंद्र नरवरिया बताते हैं कि उन्हें इस बात का दुख है कि वह आखिरी बार अपने पिता को नहीं देख सके लेकिन उन्हें इस बात का गर्व है कि उनके पिता देश की रक्षा करते हुए शहीद हुए. देवेंद्र का कहना है कि वह चाहते हैं कि उनके बच्चे भी देश सेवा के लिए सेना में भर्ती हों.