close

खास खबरें सिर्फ आपके लिए...हम खासतौर से आपके लिए कुछ चुनिंदा खबरें लाए हैं. इन्हें सीधे अपने मेलबाक्स में प्राप्त करें.

माखनलाल चतुर्वेदी : होशंगाबाद के ऐसे कवि और पत्रकार जिन्होंने ठुकरा दी थी CM की कुर्सी

माखनलाल चतुर्वेदी वरिष्ठ हिंदी कवि, लेखक और पत्रकार के साथ ओजपूर्ण भावनाओं के अनूठे हिंदी रचनाकार थे. 

माखनलाल चतुर्वेदी : होशंगाबाद के ऐसे कवि और पत्रकार जिन्होंने ठुकरा दी थी CM की कुर्सी

नई दिल्ली: माखनलाल चतुर्वेदी वरिष्ठ हिंदी कवि, लेखक और पत्रकार के साथ ओजपूर्ण भावनाओं के अनूठे हिंदी रचनाकार थे.चतुर्वेदी ने शिक्षण और लेखन जारी रखने के लिए सीएम पद को ठुकरा दिया था. उन्होंने कहा था कि 'मैं पहले से ही शिक्षक और साहित्यकार होने के नाते 'देवगुरु' के आसन पर बैठा हूं. मेरा ओहदा घटाकर तुम लोग मुझे 'देवराज' के पद पर बैठना चाहते हो जो मुझे कभी स्वीकार नहीं है'. चतुर्वेदी का जन्म 4 अप्रैल, 1889 को मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले के बावई में हुआ था. इनके पिता नंदलाल चतुर्वेदी प्राइमरी स्कूल में अध्यापक थे. चतुर्वेदी प्राथमिक शिक्षा के बाद घर पर ही संस्कृत,बंगला,अंग्रेजी,गुजरती आदि भाषाओं का सीखने लगे. चतुर्वेदी के व्यक्तित्व के कई पहलू देखने को मिलते हैं.

माखनलाल एक ज्वलंत पत्रकार थे
माखनलाल एक ज्वलंत पत्रकार थे लेकिन आत्मा से एक शिक्षक थे. उन्होंने प्रभा, कर्मवीर और प्रताप का संपादन किया. देश की आजादी के लिए लड़ाई भी लड़ी और कई बार जेल गए.1913 में 'प्रभा पत्रिका' का संपादन किया. आजादी के आंदोलन के दौरान वह स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी के संपर्क में आए, जिनसे ये बेहद प्रभावित हुए. साल 1918 में प्रसिद्ध 'कृष्णार्जुन युद्ध' नाटक की रचना की और 1919 में जबलपुर में 'कर्मयुद्ध' का प्रकाशन किया. 

माखनलाल चतुर्वेदी के बारे में एक किस्सा बहुत मशहूर है-
स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने के कारण 1921 में उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया. इसके बाद 1922 में ये रिहा हुए. साल 1924 में गणेश शंकर विद्यार्थी की गिरफ्तारी के बाद इन्होंने प्रताप का संपादन किया.माखनलाल चतुर्वेदी के बारे में एक किस्सा बहुत मशहूर है. ये मशहूर किस्सा महादेवी वर्मा अपने सहयोगियों को सुनाया करती थीं. किस्सा कुछ इस तरह है: -

आजादी के बाद जब 1956 में मध्यप्रदेश राज्य बना तब सवाल उठा कि नए राज्य के मुख्यमंत्री की कुर्सी किसे दी जाए? उस समय किसी एक नाम पर सहमति नहीं बन पा रही थी. काफी विचार-विमर्श के बाद पंडित माखनलाल चतुर्वेदी, पंडित रविशंकर शुक्ल, और तीसरा पंडित द्वारका प्रसाद मिश्रा का नाम कागज़ के तीन टुकड़ों पर लिखकर अलग रखे गए. हर टुकड़े को आपस में मिलाकर एक टुकड़े को निकाला गया. जिस पर पंडित माखनलाल चतुर्वेदी का नाम लिखा था.


(फोटो साभार- India.com) 

साल 1963 में चतुर्वेदी को पद्मभूषण से सम्मानित किया गया
इस तरह तय हुआ कि मध्यप्रदेश के पहले सीएम पंडित माखनलाल चतुर्वेदी होंगे. कांग्रेस के कई नेता नेता माखनलाल के पास गए और उन्हें सीएम बनने की सूचना देते हुए बधाई दी. इसके बाद पंडित माखनलाल चतुर्वेदी ने लोगों से कहा, मैं पहले से ही शिक्षक और साहित्यकार होने के नाते 'देवगुरु' के आसन पर बैठा हूँ. मेरा ओहदा घटाकर तुम लोग मुझे 'देवराज' के पद पर बैठना चाहते हो जो मुझे कभी स्वीकार नहीं है. इस तरह माखनलाल के सीएम पद के इंकार के बाद रविशंकर शुक्ल को मध्यप्रदेश के पहले सीएम के रूप में कुर्सी पर बिठाया गया. साल 1949 में 'हिमतरंगिनी' के लिए इन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया. 

भारत सरकार ने साल 1963 में चतुर्वेदी को पद्मभूषण से सम्मानित किया गया. 10 सितंबर, 1967 को 'राजभाषा संविधान संशोधन विधेयक' के विरोध में इन्होंने पद्म भूषण लौटा दिया. यह विधेयक राष्ट्रीय भाषा हिंदी का विरोधी था. 'एक भारतीय आत्मा' के नाम से कविताएं लिखने के कारण उन्हें 'एक भारतीय आत्मा' की उपाधि दी गई थी. भारत को आजाद कराने में वैचारिक क्रांति का अहम योगदान रहा है. 'पुष्प की अभिलाषा' शीर्षक कविता में फूल के माध्यम से माखनलाल चतुर्वेदी ने देश में खासकर युवाओं में राष्ट्र प्रेम की भावना जाग्रत करने का प्रयास किया:  

चाह नहीं, मैं सुरबाला के 
गहनों में गूँथा जाऊँ,
चाह नहीं प्रेमी-माला में बिंध
प्यारी को ललचाऊँ,
चाह नहीं सम्राटों के शव पर
हे हरि डाला जाऊँ,
चाह नहीं देवों के सिर पर
चढूँ भाग्य पर इठलाऊँ,
मुझे तोड़ लेना बनमाली,
उस पथ पर देना तुम फेंक!
मातृ-भूमि पर शीश- चढ़ाने,
जिस पथ पर जावें वीर अनेक! 
 

साभार- कविता कोश