Top Variety Buffalo For Animal Husbandry: अगर आप मध्य प्रदेश के रहने वाले हैं. तो यह खबर आपके लिए काफी फायदेमंद साबित हो सकती है. क्योंकि आज हम आपको ऐसे काम के बारे में बताने जा रहे हैं कि अच्छे-अच्छे बिजनेस भी फेल हो सकते हैं. आज के समय में कई पढ़े लिखे युवा भी इसी तरफ तेजी से भाग रहे हैं. क्योंकि इस काम से घर बैठे मोटी कमाई कर सकते हैं. दरअसल, हम पशुपालन की बात कर रहे हैं, जिससे लोग अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं. अगर आप भी पशुपालन करने का प्लान बना रहे हैं, तो भैंसों का पालन एक बेहतरीन विकल्प हो सकता है. क्योंकि भैंसों का दूध गाय के मुकाबले ज्यादा फैट वाला होता है, जिससे इसकी कीमत भी ज्यादा होती है. पैसा कमाने के लिए काफी बेहतर माना जाता है. जबकि गाय का दूध सेहत के लिए ज्यादा फायदेमंद माना जाता है, भैंसों का पालन कमाई के मामले में ज्यादा फायदेमंद है. तो आइए आज हम भैंसों की कुछ नस्लों के बारे में बताने जा रहे हैं, जिसे मध्य प्रदेश में बड़ी आसानी से पाल सकते हैं. जिससे अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं.
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अगर आप मध्य प्रदेश में रहकर भैंस पालन करना चाहते हैं. तो भैंस की इन टॉप नस्लों का पालन कर सकते हैं, जिससे आप दूध बेचकर काफी अच्छी कमाई कर सकते हैं. आइए इन नस्लों की खासियत के बारे में विस्तार से जानते हैं.
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मुर्रा भैंस, भारत ही नहीं दुनिया में सबसे ज्यादा दूध देने वाली भैंसों में से एक मानी जाती है. यह भैंस 3 साल की उम्र में गर्भधारण करने के लिए तैयार हो जाती हैं. इस भैंस की सबसे खास बात यह है कि एक दिन में 15 से 20 लीटर दूध देने की क्षमता रखती है. इसके दूध में करीब 7% तक फैट होता है, जो सेहत के लिहाज से भी फायदेमंद माना जाता है.
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वैसे तो नीली रवि नस्ल की भैंस पाकिस्तान के मिंटगुमरी इलाके में ज्यादा पाई जाती हैं. यह नस्ल रोजाना औसतन 14 से 16 लीटर तक दूध देती है, जिसमें करीब 7% फैट पाया जाता है. मादा भैंस का वजन करीब 450 किलो होता है, जो इसे खास बनाता है. खास बात यह है कि दूध देने के साथ-साथ सामान खींचने के काम भी आती है. इसलिए इसे खेती-बाड़ी में काम के लिए बेहतरीन माना जाता है.
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जाफराबादी नस्ल की भैंस गुजरात के भावनगर, जूनागढ़, अमरेली और पोरबंदर जैसे इलाकों में बड़े पैमाने पर पाली जाती हैं. यह नस्ल न सिर्फ ज्यादा बल्कि मीठा दूध देने के लिए भी जानी जाती है. रोजाना 15 से 20 लीटर तक दूध देने की क्षमता रखती है और सबसे लंबे समय तक दूध देती रहती है. खास बात ये है कि इसमें हर साल बच्चे देने की ताकत होती है.
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मेहसाणा नस्ल की भैंस, सबसे ज्यादा गुजरात और महाराष्ट्र में पाली जाती है. यह भैंस प्रति दिन लगभग 10 से 15 लीटर दूध देने की क्षमता रखती है. इस भैंस के दूध में भी अच्छी मात्रा में फैट पाया जाता है. इसकी खासियत यह है कि यह लंबे समय तक दूध देती रहती है.
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भदावरी नस्ल की भैंस उत्तर प्रदेश के कई इलाकों में पाली जाती है. इसका प्रजनन मध्य प्रदेश के ग्वालियर जिला को माना जाता है. कई तरह की बीमारियों को आसानी से झेल सकती है, इसलिए गांव के माहौल में अच्छी तरह ढल जाती है. एक ब्यांत में ये भैंस लगभग 800 से 1,000 किलो तक दूध देती है. इसके दूध में फैट की मात्रा 6% से लेकर 12% तक होती है, जो इसे और भी खास बनाती है.
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नागपुरी भैंस, जिसे लोग एलिचपुरी या बरारी के नाम से भी जानते हैं, मुख्य रूप से महाराष्ट्र के नागपुर, अकोला और अमरावती जिलों में पाई जाती है. यह नस्ल वहां के स्थानीय मौसम में अच्छे से ढल जाती है और किसान बड़े भरोसे से इसे पालते हैं. नागपुरी भैंस एक ब्यांत में लगभग 700 से 1,200 किलो तक दूध देती है, जो छोटे किसानों के लिए कमाई का अच्छा जरिया बन सकता है.
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सुरती भैंस, गुजरात के कैरा और बड़ौदा जिलों में ज्यादा पाई जाती है. इसे डेक्कनी, गुजराती या नाडियाडी नाम से भी जाना जाता है. यह नस्ल अपने पहले स्तनपान में ही करीब 1,500 से 1,600 किलो तक दूध देती है. इसकी सबसे बड़ी खासियत है कि इसके दूध में फैट की मात्रा 8 से 12 फीसदी तक होती है, जिससे दूध की क्वालिटी बेहतरीन होती है और बाजार में अच्छा दाम मिलता है.
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महाराष्ट्र के सूखे इलाकों के लिए एकदम उपयुक्त मानी जाने वाली पंढरपुरी भैंस ताकतवर और लंबे शरीर वाली होती है. ये भैंस हर 12 से 13 महीने में एक बछड़ा देती है, इसलिए इसे ज्यादा प्रजनन क्षमता वाली नस्ल माना जाता है. रोजाना 6 से 7 लीटर तक दूध देती है, लेकिन अगर अच्छे आहार और देखभाल मिले तो 15 लीटर तक भी दूध दे सकती है.
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गोदावरी भैंस कम खर्च में पल जाती है और इसकी रोगों से लड़ने की ताकत काफी अच्छी होती है. इसकी प्रजनन क्षमता भी बढ़िया होती है और गर्भधारण का समय करीब 280 दिन का होता है. यह रोजाना 6 से 9 लीटर तक दूध देती है, लेकिन अगर इसे बढ़िया माहौल और देखभाल मिले तो 12 से 16 लीटर तक भी दूध दे सकती है. इसके दूध में फैट 5 से 7 प्रतिशत तक होता है.
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बन्नी भैंस, गुजरात के कच्छ जिले में पाई जाती है, इसे कच्छी या कुंडी नाम से भी जाना जाता है. यह नस्ल बाकी भैंसों की तुलना में ज्यादा दूध देती है और बीमारियों से भी अच्छी तरह लड़ लेती है. इसकी एक और खासियत यह है कि इसे आनुवंशिक तौर पर सुधारकर दूध उत्पादन बढ़ाने के लिए चुना गया है, जिससे यह आज किसानों की पहली पसंद बन गई है.
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