Satna jail News: सतना की केंद्रीय जेल से रिहा हुआ कैदी योगेंद्र सिंह अपनी शिक्षा और मेहनत से सुधार की मिसाल बन गया. 13 साल की सजा के दौरान डबल एमए, कोचिंग और अच्छे आचरण के कारण वह समाज के लिए प्रेरणा बन गया.
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Satna News: सतना में जनजातीय गौरव दिवस इस बार कई परिवारों के लिए खुशियों का दिन बन गया. प्रदेश सरकार ने शनिवार को राज्यभर की जेलों में उम्रकैद की सजा काट रहे कई कैदियों को रिहा करने का फैसला लिया. इसी क्रम में सतना की केंद्रीय जेल से भी 3 कैदी अपने घर लौटे. इनमें सबसे ज्यादा चर्चा उस कैदी की रही, जिसकी जिंदगी अपराध से पश्चाताप और फिर सुधार की मिसाल बन गई. यह कहानी है सतना के योगेंद्र सिंह उर्फ सिंटू की, जिसने जेल की चारदीवारी के भीतर रहकर अपनी जिंदगी को बिल्कुल नई दिशा देने की कोशिश की.
योगेंद्र सिंह को साल 2012 में आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी. लेकिन जेल में रहने के दौरान उसने खुद को बदलने की ठान ली. योगेंद्र ने शिक्षा को हथियार बनाया और 13 साल की सजा के दौरान डबल एमए की पढ़ाई पूरी कर डाली. इग्नू से हिंदी और इतिहास में मास्टर्स करने के बाद उन्होंने भोज विश्वविद्यालय से श्रीरामचरित मानस से सामाजिक विकास पर डिप्लोमा भी हासिल किया. इसी के साथ उन्होंने हिंदी और अंग्रेजी टाइपिंग, कंप्यूटर कोर्स भी पूरा किया. जेल प्रशासन भी उसके इस सकारात्मक बदलाव से प्रभावित हुआ.
अच्छे आचरण के कारण योगेंद्र को जेल प्रशासन ने ‘खुली जेल’ में भेज दिया. यहां उसे दिनभर बाहर काम करने की अनुमति मिल गई. इसका फायदा उठाकर योगेंद्र ने सतना शहर के एक निजी कोचिंग संस्थान में पढ़ाना शुरू किया. करीब 5000 रुपये महीने की कमाई से वह अपने परिवार का खर्च चलाने में मदद करता रहा. उसके व्यवहार और मेहनत को देखकर हर कोई हैरान था कि जो व्यक्ति अपराध के बाद जेल पहुंचा, वही अब बच्चों का भविष्य संवारने में लगा हुआ है. परिवार भी उसके इस बदलाव से भावुक और खुश था.
योगेंद्र की जिंदगी में बड़ा मोड़ 2010 में आया, जब उसकी भाभी की मौत हुई और पूरे परिवार पर हत्या का मामला दर्ज हो गया. 2012 में अदालत ने योगेंद्र, उसके माता-पिता, भाई और बहन को उम्रकैद की सजा सुनाई. बाद में अपील पर भाई और बहन बरी हो गए. योगेंद्र की मां को खराब स्वास्थ्य के कारण पिछले साल घर भेजा गया था, जहां कुछ समय बाद उनका निधन हो गया. पिता लक्ष्मण सिंह अब भी सजा काट रहे हैं और 12 महीने बाद रिहा होंगे. हालांकि इतने मुश्किल दौर से गुजरने के बाद भी योगेंद्र ने हार नहीं मानी और अपनी जिंदगी को सही दिशा देने का प्रयास जारी रखा.
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