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राजनांदगांव: मुक्तिबोध की कर्मस्थली, एग्जाम में फेल होने के दर्द ने बना दिया साहित्यकार

'ब्रह्मराक्षस' कविता के जरिये मुक्तिबोध ने बुद्धिजीवी वर्ग के द्वंद्व और आम जनता से उसके अलगाव की व्‍यथा का मार्मिक चित्रण किया है.

राजनांदगांव: मुक्तिबोध की कर्मस्थली, एग्जाम में फेल होने के दर्द ने बना दिया साहित्यकार

नई दिल्ली: आधुनिक हिंदी साहित्य के इतिहास का कोई भी ऐसा जानकार नहीं होगा जो कि 'मुक्तिबोध' के नाम से परिचित नहीं होगा. कवि, आलोचक, निबंधकार, कहानीकार व उपन्यासकार लिखने वाले चुनिंदा लेखकों में से एक थे मुक्तिबोध. बीसवीं सदी की प्रगतिशील हिंदी कविता और आधुनिक कविता के बीच का सेतु माने जाने वाले प्रख्यात गजानन माधव मुक्तिबोध के बारे में डॉक्टर नामवर सिंह ने कहा था-

'नई कविता में मुक्तिबोध की जगह वही है ,जो छायावाद में निराला की थी. निराला के समान ही मुक्तिबोध ने भी अपनी युग के सामान्य काव्य-मूल्यों को प्रतिफलित करने के साथ ही उनकी सीमा की चुनौती देकर उस सर्जनात्मक विशिष्टता को चरितार्थ किया, जिससे समकालीन काव्य का सही मूल्यांकन हो सका'.

गजानन माधव मुक्तिबोध का जन्म 13 नवंबर, 1917 को श्योपुर (ग्वालियर) में हुआ था. इनकी प्रारंभिक शिक्षा उज्जैन में हुई. मुक्तिबोध के पिता पुलिस विभाग के इंस्पेक्टर थे और उनका तबादला होता रहता था. जिसकी वजह से मुक्तिबोध को पढ़ाई में बहुत बाधा पहुंची.1930 में मुक्तिबोध मिडिल की परीक्षा में फेल हो गए थे. 

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परीक्षा में फेल होना मुक्तिबोध के जीवन की सबसे बड़ी घटना बनी. मुक्तिबोध ने पारिवारिक असहमति और विरोध के बाद भी 1939 में शांता के साथ प्रेम विवाह किया था. मुक्तिबोध इंदौर के होल्कर से 1938 में बी.ए. करने के बाद उज्जैन के माडर्न स्कूल में टीचर बन गये थे. इसके बाद उज्जैन, कलकत्ता, इंदौर, मुंबई,बनारस तथा जबलपुर आदि जगहों पर नौकरी करते रहे.

1942 के आसपास वे वामपंथी विचारधारा की ओर झुके और शुजालपुर में रहते हुए उनकी वामपंथी चेतना मजबूत हुई. 1942 के आंदोलन में जब शारदा शिक्षा सदन बंद होने के बाद वह उज्जैन चले गये. उसके बाद उन्होंने कई तरह की नौकरी बदली. 1948 में नागपुर में सूचना तथा प्रकाशन विभाग, आकाशवाणी और 'नया खून ' में काम किया. और 1958 में मुक्तिबोध को छत्तीसगढ़ के दिग्विजय महाविद्यालय, राजनांदगांव में प्रिंसिपल की नौकरी मिली.

मुक्तिबोध ने लिखा है कि - नौकरियां पकड़ता और छोड़ता रहा. शिक्षक, पत्रकार, पुनः शिक्षक, सरकारी और गैर सरकारी नौकरियां नौकरियाँ. निम्न-मध्यवर्गीय जीवन, बाल-बच्चे, दवा-दारू, जन्म-मौत में उलझा रहा. 

गजानन माधव मुक्तिबोध का छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव शहर से बहुत गहरा नाता रहा है. मुक्तिबोध ने राजनंदगांव में रहते हुए अपना गहन साहित्य रचा. 'ब्रह्मराक्षस' और 'अंधेरे में' मुक्तिबोध का सांसारिक संघर्ष निखरकर सामने आया है. वह 1958 से से लेकर मौत तक वह राजनांदगांव दिग्विजय कॉलेज से जुड़े रहे. यहीं पर उनके निवास स्थल को मुक्तिबोध स्मारक के रूप में यादगार बनाकर वहां हिंदी के दो अन्य साहित्यकार पदुमलाल बख्शी और डॉ.बलदेव प्रसाद मिश्र की स्मृतियों को संजोते हुए 2005 में एक संग्रहालय की स्थापना भी की गई.

मुक्तिबोध को अपने जीवन काल में न तो बहुत पहचान मिली और न ही उनका कोई भी कविता संग्रह प्रकाशित हो सका. मौत के पहले श्रीकांत वर्मा ने उनकी केवल 'एक साहित्यिक की डायरी' प्रकाशि‍त की थी, जिसका दूसरा संस्करण भारतीय ज्ञानपीठ से उनके मौत के दो महीने बाद प्रकाशि‍त हुआ. ज्ञानपीठ ने ही 'चांद का मुंह टेढ़ा है' प्रकाशि‍त किया था. लेकिन उनकी असमय मृत्‍यु के बाद ही मुक्तिबोध हिंदी साहित्य के परिदृश्‍य पर छा गए. मुक्तिबोध ने कहानी, कविता, उपन्यास, आलोचना और अन्य विधाओं में लिखा और हर क्षेत्र में उनका हस्‍तक्षेप अलग से महसूस किया जा सकता है.

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उन्‍हें प्रगतिवाद, प्रयोगवाद, नई कविता आदि साहित्यिक आंदोलनों के साथ जोड़कर देखा जाता है. 'अंधेरे में' और ब्रह्मराक्षस मुक्तिबोध की सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण रचनायें मानी जाती हैं. 'ब्रह्मराक्षस' कविता के जरिये मुक्तिबोध ने बुद्धिजीवी वर्ग के द्वंद्व और आम जनता से उसके अलगाव की व्‍यथा का मार्मिक चित्रण किया है. वहीं 'अंधेरे में मुक्तिबोध की अंतिम कविता है और शायद सबसे महत्‍वपूर्ण भी. इस कविता के जरिए मुक्तिबोध ने सत्‍ता और बौद्धक वर्ग के बीच गठजोड़, उनके बेनकाब होने, सत्‍ता द्वारा लोगों पर दमन, पुराने के ध्‍वंस पर नये के सृजन, इतिहास के बारे में नए दृष्टिकोण देखने को मिलते है.

‘वे आते होंगे लोग....
अरे जिनके हाथों में तुम्हें सौंपने ही होंगे 
ये मौन उपेक्षित रत्न
मात्र तब तक
केवल तब तक
तुम छिपा चलो धुरिमान उन्हें तम गुहा तले
ओ संवेदन मय ज्ञान नाग
कुंडली मार तुम दबा रखो 
फूटती रश्मियां.‘
'वे आते ही होंए लो
जिन्हें तुम दोगे देना ही होगा पूरा हिसाब
अपना सबका, मन का, जन का'.

                                                             साभार-  अंधेरे में 

मुक्तिबोध की रुचि अध्ययन-अध्यापन, पत्रकारिता, समसामयिक राजनीतिक एवं साहित्य के विषयों पर लेखन में थी. मध्यप्रदेश सरकार ने 1962 में उनकी पुस्तक भारत: इतिहास और संस्कृति पर प्रतिबंध लगा दिया था. जिससे उन्हें मानसिक चोट पहुंचीं बाद में उन्हें 1964 में पैरालाइज का झटका लगा. उन्हें एम्स में भर्ती भी कराया गया लेकिन मुक्तिबोध 11 सितंबर 1964 को इस दुनिया को अलविदा कह गए.