छत्तीसगढ़ः करोड़ों की सरकारी योजनाएं फेल, आदिवासी किसान बोले- उनके साथ हुआ बड़ा मजाक

वन अधिकार से मिली भूमि पर पर करोड़ों रुपए खर्च कर शुरू की गई योजना विफल हई है. योजना के अंतर्गत खोदे गए 27 बोर में से 24 बोर फेल. योजना के तहत रोपित किए गए 6 हजार से अधिक मुनगे के पेड़ों में से एक भी पेड़ जीवीत नहीं बचा है. 

छत्तीसगढ़ः करोड़ों की सरकारी योजनाएं फेल, आदिवासी किसान बोले- उनके साथ हुआ बड़ा मजाक
सांकेतिक तस्वीर

दुर्गेश सिंह बिसेन/पेंड्रा: छत्तीसगढ़ में आदिवासियों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए शासन द्वारा शुरू की गई योजना फेल होती नजर आ रही है.वन अधिकार से मिली भूमि पर पर करोड़ों रुपए खर्च कर शुरू की गई योजना विफल हई है. योजना के अंतर्गत खोदे गए 27 बोर में से 24 बोर फेल. योजना के तहत रोपित किए गए 6 हजार से अधिक मुनगे के पेड़ों में से एक भी पेड़ जीवीत नहीं बचा है. 

ग्रामीण आदिवासियों को मुख्यधारा में लाने, उनकी आजीविका के साधन बढ़ाने एवं आत्मनिर्भर बनाने के लिए केंद्र एवं राज्य सरकार बहुत सी योजनाएं बनाती है. जिसके लिए विभिन्न सरकारी विभाग काम भी करते हैं. इन योजनाओं के क्रियान्वयन में करोड़ों रुपए खर्च भी किए जाते हैं. पर जब इन योजनाओं को धरातल पर उतारा जाता है तो योजनाएं कहीं नजर नहीं आती. ऐसा ही कुछ हुआ है गौरेला विकासखंड के पकरिया गांव में हुआ.

यहां वन अधिकार अधिनियम के तहत आदिवासियों को मिले वन अधिकार पट्टा की भूमि पर 'हमर जंगल हमर आजीविका योजना' के तहत गांव के 62 किसानों को चयनित कर आत्मनिर्भर बनाने की कार्ययोजना बनाई गई. योजना के तहत इन किसानों को वन अधिकार अधिनियम के तहत मिले भूमि को चिन्हांकित किया गया. जिसमें लगभग 208 एकड़ भूमि की बाड़बंदी की गई. योजना के तहत फेंसिंग के बाद इस भूमि पर किसानों के लिए नलकूप का उत्खनन किया गया. बिजली की समस्या ना हो इसलिए क्रेडा विभाग की ओर से सभी नलकूपों में सोलर सिस्टम लगाए गए.

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योजना के नाम पर फेंसिंग बची
जल स्तर बनाए रखने एवं मछली पालन के लिए डबरी ( छोटे तालाब) खोदे गए, इसके साथ ही खाली पड़ी जमीन पर मुनंगे के 6000 से ज्यादा पौधे रोपित किए गए. ग्रामीणों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए बकरी पालन एवं मुर्गी पालन की योजना लागू की गई, जिसके लिए शेड निर्माण किया गया. 2017-18 में शुरू की गई यह योजना जब आज फलीभूत हो जानी चाहिए थी तो मौके पर जाकर देखने में पता चलता है कि पूरी योजना ध्वस्त हो गई है.योजना के नाम पर सिर्फ फेंसिंग ही बची है. बाकी सारे काम विफल हैं.

दरअसल पानी की व्यवस्था कराने के लिए लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग ने जो नलकूप खोदे उनमें से सिर्फ 3 बोर ही वर्तमान में जीवित हैं. किसानों की मानें तो नलकूप खोदने के 1 माह के अंदर ही खराब हो गए थे, पानी निकलना बंद हो गया था. ऐसा 1-2 बोर के साथ नहीं बल्कि 24 नलकूपों के साथ हुआ है. नलकूप बंद होने के बाद चोरों की निगाह भी पड़ी तो किसी ने तार चोरी कर लिया किसी ने मोटर चोरी कर लिया.

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नलकूपों से खेतों तक पानी पहुंचाने के लिए अंडरग्राउंड पाइप बिछाए गए पर पानी के अभाव में पाइप कहां तक टिकते वह भी टूट कर बिखर गए और आज यह कबाड़ की तरह नजर आते हैं. वहीं यदि बकरी पालन और मुर्गी पालन की बात करें तो इसका जिम्मा पशु चिकित्सा सेवाएं विभाग को दिया गया था. पंचायत विभाग ने तो ग्रामीणों के घर में मुर्गी पालन एवं बकरी पालन के शेड तैयार कर दिए, पर योजना के तहत पशु चिकित्सा विभाग द्वारा चयनित किए गए 36 किसानों में से सिर्फ 12 कृषकों को ही मुर्गी के बच्चे दिए गए,जिसके बाद विभाग ने पलटकर नहीं देखा. सारे चूजे एक महीने के अंदर ही किसी बीमारी से मर गए.

किसानों के साथ हुआ बड़ा मजाक 
किसानों का कहना है कि बड़ा मजाक बकरी वितरण में किया गया है. योजना के लिए शेड तो बनाए गए पर किसी भी किसान को बकरी नहीं दी गई. वहीं उद्यान विभाग को यहां मुनगे के पौधे रोपित करने के जिम्मेदारी सौंपी गई थी. जिसके तहत 6 हजार से अधिक मुनगे के पौधे रोपित किए गए. पर विभाग का ग्रामीणों के साथ खिलवाड़ ऐसा कि 6 हजार में से आज मुनगे के एक भी पौधे जीवित नहीं हैं. मुनगे के पत्ते रखने के लिए लाखों की लागत से बड़ा गोदाम बना दिया गया, लेकिन पत्ते आना तो दूर पेड़ बनने से पहले ही उसके पौधे खत्म हो गए.

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