कोरोना की मार: रोजी-रोटी का संकट, साल भर की मेहनत और सीज़न में भी ये नहीं कर पा रहे कारोबार!

कुम्हारों का बनाया लाखों का माल बिकने को तैयार है लेकिन कोरोना में कहीं से ना तो व्यापारी यह माल लेने आ रहे हैं ना ही ग्राहक.

कोरोना की मार: रोजी-रोटी का संकट, साल भर की मेहनत और सीज़न में भी ये नहीं कर पा रहे कारोबार!
कुम्हार

बालाघाट: कोरोना संकट ने ऐसा घेरा है कि कई लोगों को दो जून की रोटी के लिए भी तरसना पड़ रहा है. अब  मिट्टी को खोदकर अपनी कला के जरिए उसे आकार देने वाले कुम्हार भूखे मरने की कगार पर है. बालाघाट के कुम्हारी मोहल्ला और गांव लिंगा के मटके जो अपनी गुणवत्ता के लिए जाने जाते है. इन्हे बनाने वाले कुम्हारों के सामने भी रोजी रोटी का संकट है. साल भर मेहनत करके उन्होंने मटके और मिट्टी के बर्तन तैयार किए. जब सीज़न आया तो कोरोना कर्फ्यू लग गया.

बना हुआ माल घर पर तैयार है. इसे बेचकर साल भर की रोटी का जुगाड़ होता था. लेकिन अब उसकी उम्मीद भी टूट रही है. ऊपर से सामने बारिश है सीजन चला गया. बता दें कि अक्षय तृतीया पर भी नए कलश भरने का रिवाज है. लेकिन लॉकडाउन में इस पर्व पर भी कुम्हारों को कोई रोजी नसीब होगी इसकी संभावना उन्हें नहीं है.

दोहरी मार झेलने को मजबूर
मिट्टी के बर्तन बनाकर अपनी आजीविका चलाने वाले कुम्हार जाति के लोगों के लिए कोरोना कर्फ़्यू में दोहरी मार पड़ रही है. पहले से ही ये लोग सरकार की उदासीनता के चलते उपेक्षा के शिकार है. हालात इसलिए भी बदतर होते जा रहे हैं कि अब मिट्टी के बर्तनों के ग्राहक कम मिल रहे हैं. ऐसे में पीढिय़ों से इस कला को जीवित रखकर अपना पेट पालने वालों को मुश्किल दौर से गुजरना पड़ रहा.

कुम्हारों की आपबीती
इनके हालात जानने के लिए हमने कुम्हार गणेश से बात की तो बताया कि कुम्हारों के ऐसे हालात बालाघाट और ग्राम पंचायत लिंगा और आसपास क्षेत्रों में देखने को मिल रहा है. जहां पर कुम्हार अपनी आजीविका चलाने के लिए चाक पर मिट्टी के बर्तन बनाकर इस कला को जीवित रखने का प्रयास कर रहे हैं. लेकिन अभी खुद लाचार है. इस बार के सीजन में भी इक्का दुक्का माल बिक रहा है. बाहर से हमको नगद मिट्टी लाना पड़ता है. व्यापारी पैसे मांग रहा है.घर में बैठे है.

वहीं कुम्हार डेविड कुमार बताते है कि हम लोगों का माल नहीं बिक रहा है सरकार ने ठंडे पानी पीने पर रोक लगाई है. पर आरोह और फ्रिज का पानी तो पी ही रहे हैं सरकार को हमारे बारे में सोचना चाहिए.

कुम्हार मीरा बाई पिछले बार का माल भी वैसे ही पड़ा हुआ है. इस बार भी माल नहीं बिक रहा. मिट्टी मिलने में भी दिक्कत हो रही है सरकार से कोई मदद नहीं मिल रही.

मेहनत मिट्टी में मिल रही है
हर साल 6- 8 महीने पहले यह तबका मटके बनाता है. गर्मी की शुरुआत से लेकर अक्षय तृतीया तक इन्हें बेचकर साल भर की रोटी का जुगाड़ कर लेता है. दो दिन बाद अक्षय तृतीया है. कुम्हारों का बनाया लाखों का माल बिकने को तैयार है. लेकिन कोरोना में कहीं से ना तो व्यापारी यह माल लेने आ रहे हैं ना ही ग्राहक. गरीब मजदूरों की साल भर की मेहनत जो मिट्टी को आकार देकर बिकने के लिए तैयार है. अब मिट्टी में मिलती दिख रही है.

कोरोना महामारी के चलते लोगों में दहशत है. लोग ठंडे पानी की जगह गरम पानी पी रहे हैं. यही वजह है कि मिट्टी के बर्तन नहीं बिक रहे. कुम्हार परिवारों ने महीनों पहले मटकों और सुराही का निर्माण शुरू कर दिया था. ताकि जैसे ही गर्मी के मौसम की शुरुआत होगी तो इसकी बिक्री कर सकें. लेकिन इस बार के सीजन में भी कुम्हारों की उम्मीदों में मिट्टी में मिलती दिखाई दे रही है. अब इन कुम्हारों को सिर्फ सरकार से ही उम्मीद है.

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