Women's Day Special: पिछले 32 वर्षों से नक्लसियों के गढ़ दंतेवाड़ा में स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचा रहीं 'डॉ मौसी'

'डॉ मौसी' के नाम से मशहूर गंगा शांडिल्य ने प्रण लिया है कि वो दंतेवाड़ा के बीहड़ों के किसी बच्चे को पोलियो का शिकार नहीं होने देंगी.  

Women's Day Special: पिछले 32 वर्षों से नक्लसियों के गढ़ दंतेवाड़ा में स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचा रहीं 'डॉ मौसी'
दंतेवाड़ा की 'डॉ मौसी'.

दंतेवाड़ा: नक्सलियों का गढ़ कहे जाने वाले दंतेवाड़ा में काम करना किसी चुनौती से कम नहीं है. कई इलाकों में कदम-कदम पर IED व स्पाइक होल्स का खतरा हमेशा बना रहता है. ऐसे में इन इलाकों में पुरुष भी अपनी पोस्टिंग से हाथ खड़े कर देते हैं. लेकिन पिछले 32 सालों से समेली की स्वास्थ्य कार्यकर्ता गंगा शांडिल्य ग्रामीणों को स्वास्थ्य सुविधा पहुंचा रही हैं.

'डॉ मौसी' के नाम से मशहूर हैं गंगा शांडिल्य
जिले के सबसे सवेंदनशील इलाके समेली, अरबे, जबेली, ककाड़ी, अरनपुर, पेड़का ऐसे गांव हैं, जिन्हें सुनकर सबसे पहले माओवाद की दहशत की तस्वीर सामने आती है. यहां बिजली, पानी, सड़क जैसी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराना बड़ी चुनौती है. वहीं, स्वास्थ्य कार्यकर्ता गंगा शांडिल्य खुद पोलियो जैसी गंभीर बीमारी की शिकार हैं, लेकिन उन्होंने प्रण लिया है कि वो दंतेवाड़ा के बीहड़ों के किसी बच्चे को पोलियो का शिकार नहीं होने देंगी. इसी प्रण ने गंगा को पिछले 32 सालों से दंतेवाड़ा के बीहड़ों से जोड़ रखा है. वहीं इलाके के लोग इन्हें अब 'डॉ मौसी' कहकर बुलाते हैं.

पोलियो से ग्रसित हैं गंगा शांडिल्य
धमतरी निवासी ANM गंगा शांडिल्य साल 1988 से समेली में स्वास्थ्य कार्यकर्ता के तौर पर काम कर रही हैं. गंगा पोलियो से ग्रसित हैं, जिस वजह से उनका एक हाथ काम नहीं करता. वो एक हाथ से ही दवाइयों से भरे 15-20 किलो वजनी वैक्सीन कैरियर, झोले को उठाकर बीहड़ों में इलाज के लिए निकलती हैं. वो एक हाथ से ही इंजेक्शन लगाती हैं.

बचपन में ही ले लिया था प्रण
गंगा बताती हैं कि बचपन में उन्हें पोलियो की खुराक नहीं पिलाई गई. जिसका दर्द उन्हें आज तक झेलना पड़ रहा है. बचपन में ही ठान लिया था कि स्वास्थ्य कार्यकर्ता बनकर ऐसे इलाके में जाऊंगी जहां सबसे ज्यादा जरूरत है. किसी बच्चे को पोलियो का शिकार नहीं होने दूंगी.

बेहद चुनौती भरा है गंगा का काम
नक्सल प्रभावित समेली के बारे में गंगा ने बताया कि यहां जगह- जगह IED, स्पाइक होल्स का खतरा बना रहता है. जंगल, नाले, पहाड़ों को पारकर कई किलोमीटर पैदल चलकर लोगों तक पहुंचना अपने आप में चुनौती है. गंगा ने बताया कि कई बार आईईडी, स्पाइक होल की चपेट में आने से बची हूं. झोपड़ी में स्वास्थ्य केंद्र शुरू हुआ था. 2007 में आंखों के सामने नक्सलियों ने उपस्वास्थ्य केंद्र के भवन को तोड़ दिया. लेकिन इन सब चुनौतियों से पार कर पहुंचना जरूरी है. ग्रामीणों के बुलावे पर आधी रात को भी जाना पड़ता है. घरवाले वापस आने के लिए कहते हैं लेकिन ग्रामीणों के बीच प्यार-अपनापन मिलता है.

पिछले 32 साल से दे रही हैं स्वास्थ्य सेवाएं
समेली, जबेली, ककाड़ी, अरबे की करीब 4000 की आबादी का इलाज करती हैं. उपस्वास्थ्य केंद्र में सुविधाएं नहीं थीं तब घर- घर पहुंच सुरक्षित प्रसव भी करवाया है. इस इलाके के करीब 1800 बच्चे गंगा के हाथों जन्में हैं. गंगा इस इलाके की पहली स्वास्थ्य कार्यकर्ता हैं, जो पोस्टिंग के बाद से ही यहां काम कर रही हैं. समेली के सरपंच पति संजय कुंजाम ने बताया कि बचपन से ही डॉक्टर मौसी को देखता आ रहा हूं, ये कई किमी पैदल चलकर स्वास्थ्य सुविधा पहुंचाती हैं.

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