देश में क्यों बढ़ रहे हैं पेट्रोल-डीजल के दाम, सरकार क्यों नहीं कर रही कम? जानिए वजह

भारत में Petrol-Diesel की कीमत में बढ़ोतरी की एक बड़ी वजह इस पर लगने वाली सेंट्रल एक्साइज ड्यूटी और विभिन्न राज्यों के टैक्स हैं. 

देश में क्यों बढ़ रहे हैं पेट्रोल-डीजल के दाम, सरकार क्यों नहीं कर रही कम? जानिए वजह
Petrol Diesel के दाम लगातार बढ़ रहे हैं.

नई दिल्लीः देश में इन दिनों पेट्रोल डीजल के दाम आसमान छू रहे हैं. कई राज्यों में पेट्रोल का दाम 100 रुपए प्रति लीटर तक पहुंच गया है. डीजल करीब 85 रुपए लीटर बिक रहा है. जिसे लेकर विपक्ष सरकार पर जमकर निशाना साध रहा है. आशंका जताई जा रही है कि अगर जल्द ही पेट्रोल डीजल के दामों को नियंत्रित नहीं किया गया तो इससे महंगाई भी बढ़ सकती है. सरकार का तर्क है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल की कीमत बढ़ गई है, जिसके चलते भारतीय बाजार में पेट्रोल डीजल के दाम बढ़ गए हैं. हालांकि दुनिया के कई देशों की तुलना में भारत में पेट्रोल डीजल के दामों में भारी उछाल आया है, जिसका कारण निम्न है. 

भारतीयों को क्यों देनी पड़ रही है ज्यादा कीमत?
भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमत में बढ़ोतरी की एक बड़ी वजह इस पर लगने वाली सेंट्रल एक्साइज ड्यूटी और विभिन्न राज्यों के टैक्स हैं. इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार, बीते साल ही सरकार ने सेंट्रल एक्साइज ड्यूटी और राज्यों ने अपने-अपने टैक्स में भी बढ़ोतरी की है. जिसमें केन्द्र ने सेंट्रल एक्साइज में पेट्रोल पर 13 रुपए प्रति लीटर और डीजल पर 16 रुपए प्रति लीटर की बढ़ोतरी की है. 

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यही वजह है कि इस वक्त देश में पेट्रोल डीजल की कीमतें काफी ज्यादा बढ़ गई हैं. उदाहरण के लिए रिफाइनरी से डीलर तक आने में पेट्रोल की कीमत दिल्ली में करीब 32 रुपए प्रति लीटर पड़ रही है. इसके बाद ग्राहकों को जो पेट्रोल बेचा जाता है उसमें केन्द्र की एक्साइज ड्यूटी 33 रुपए प्रति लीटर और राज्यों के टैक्स के करीब 20 रुपए प्रति लीटर समेत कुछ और टैक्स भी शामिल होते हैं. इस तरह ग्राहक को दिल्ली में एक लीटर पेट्रोल करीब 90 रुपए पड़ रही है. जिन राज्यों में पेट्रोलियम पर टैक्स ज्यादा है, वहां यह कीमत और भी ज्यादा हो गई है.

अंतरराष्ट्रीय बाजार का भी पड़ रहा असर
कोरोना महामारी के दौर में क्रूड ऑयल के प्रोडक्शन को तगड़ा झटका लगा था. दरअसल लॉकडाउन के चलते लोग अपने घरों में कैद रहे और वाहनों और इंडस्ट्री में पेट्रोलियम का इस्तेमाल कम हुआ. यह चलन किसी एक देश में नहीं बल्कि पूरी दुनिया में देखा गया. इसका सीधा असर क्रूड ऑयल (कच्चा तेल) उत्पादक देशों पड़ा. इसके चलते वैश्विक स्तर पर क्रूड ऑयल की कीमतों में भारी गिरावट आई. 

लॉकडाउन के दौरान एक वक्त क्रूड ऑयल (कच्चे तेल) की कीमत  20 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर पहुंच गई थी. इसके बाद इसमें बढ़ोतरी होनी शुरू हुई और बीते साल अक्टूबर तक यह 40 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया. अब जैसे ही कोरोना महामारी का असर कम हुआ है और दुनिया भर में कोरोना वैक्सीन लगाई जा रही है तो कच्चे तेल की मांग में फिर से तेजी आई है और अब यह 60 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर पहुंच गया है. यही वजह है कि स्थानीय स्तर पर भी इसका असर पड़ा है और कच्चे तेल की कीमतों में भारी इजाफा हुआ है. 

कीमतें बढ़ाने के लिए ओपेक देश कर रहे चालाकी
कुछ तो कच्चे तेल की मांग में तेजी आई है, दूसरा कच्चे तेल का उत्पादन करने वाले देश भी कीमतें बढ़ाने के लिए चालाकी कर रहे हैं. दरअसल तेल उत्पादक देश अपने प्रोडक्शन में गिरावट कर रहे हैं, जिससे तेल की कीमतें पूरी दुनिया में बढ़ रही हैं. सऊदी अरब ने तो ऐलान किया है कि वह अपने तेल उत्पादन में रोजाना 10 लाख बैरल की कटौती करने जा रहा है. चूंकि प्रोडक्शन कम हो रहा है और मांग बढ़ रही है तो इसका सीधा असर कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ रहा है और उनमें इजाफा हो रहा है.

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सरकार की ये है मजबूरी
सरकार अपने राजस्व के लिए बहुत हद तक पेट्रोल डीजल की बिक्री पर निर्भर है. बीते साल कोरोना महामारी के चलते सभी आर्थिक गतिविधियां बंद रहीं, जिसके चलते सरकार के राजस्व में भारी कमी आई है. इससे सरकार का राजकोषीय घाटा भी काफी बढ़ गया है. ऐसे में सरकार अपनी कमाई के मुख्य स्त्रोत में भी कटौती करने की इच्छुक नहीं है. यही वजह है कि विरोध के बावजूद सरकार ने पेट्रोल डीजल पर लगने वाले टैक्स में कटौती का अभी तक कोई ऐलान नहीं किया है. 

अन्य देशों में कितना लगता है टैक्स?
बता दें कि पेट्रोलियम पर कई देशों में भारी टैक्स लगाया जाता है. भारत में अभी पेट्रोलियम पर करीब 60 प्रतिशत टैक्स लगता है. इसी तरह जर्मनी और इटली आदि देशों में भी पेट्रोलियम पर टैक्स करीब 65 फीसदी है. हालांकि जापान में यह दर 45 फीसदी है और अमेरिका में तो यह सिर्फ 20 फीसदी ही है.