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नक्सली हिंसा के शिकार हुए परिवारों को नहीं मिल पा रहा छत्तीसगढ़ सरकार की योजनाओं का लाभ

बीते वर्षों में राजनांदगांव जिले के नक्सल प्रभावित इलाकों में नक्सलियों ने कई बेगुनाह ग्रामीणो को मुखबिरी के शक में मौत के घाट उतार दिया.

नक्सली हिंसा के शिकार हुए परिवारों को नहीं मिल पा रहा छत्तीसगढ़ सरकार की योजनाओं का लाभ
पुलिस अधिकारियों का कहना है कि उनके पास कोर्ट से किसी तरह का कोई पत्र या नोटिस नहीं आया है.

राजनांदगांव: छत्तीसगढ़ में नक्सलियों की हिंसा का शिकार हुए बेगुनाह लोगों को सरकार से मिलने वाली सहायता और योजनाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा है. दरअसल, राजनांदगांव जिले में नक्सल प्रभावित परिवार सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं. अफसरों और मंत्रियों की दहलीज के चक्कर काटने के बाद भी जब कोई सुनवाई नहीं हुई, तो लोग न्यायालय की शरण में जाने को मजबूर हो गए. जिसके बाद 9 अक्टूबर 2019 को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने राज्य शासन के मुख्य सचिव, डीजीपी, राजगांदगांव के एसपी और कलेक्टर को नोटिस जारी किया गया है.

बीते वर्षों में राजनांदगांव जिले के नक्सल प्रभावित इलाकों में नक्सलियों ने कई बेगुनाह ग्रामीणो को मुखबिरी के शक में मौत के घाट उतार दिया. नक्सलियों ने किसी के बेटे, किसी के पति या फिर किसी के पिता को मुखबिर मानकर मार दिया. जिले के नक्सल प्रभावित इलाकों में दर्जनों परिवार ऐसे हैं, जिन्होंने नक्सली हिंसा का दंश उस वक्त तो झेला ही, लेकिन अभी भी उनकी तकलीफे कम नहीं हुई हैं. परिवार के मुख्य कमाने वाले सदस्य की हत्या हो जाने के बाद परिजनों को उम्मीद थी कि सरकार उनके लिये कुछ करेगी. लेकिन, उन्हें अपना हक मांगने के लिये अफसरों से लेकर मंत्रियों के दर पर चक्कर काटने पड़ रहे हैं. 

मानपुर इलाके की शोभा सलामे के पिता और पति की नक्सलियों ने पुलिस का मुखबिर होने के शक में हत्या कर दी थी. शोभा को सरकार से मुआवजा राशि और नौकरी मिली है, लेकिन उनका कहना है कि सरकार की ओर से उन्हें आवास के अलावा बच्चों की पढ़ाई सहित अन्य योजनाओं का लाभ भी मिलना चाहिये था. जो आज तक नहीं मिला है. वहीं, ओन्धी थाना अंतर्गत ग्राम उंचापुर की रहने वाली दुकली बाई सलामे के बेटे राजेश की भी नक्सलियों ने अपहरण कर हत्या कर दी थी. दुकली बाई को चपरासी की नौकरी दी गई है, लेकिन शोभा की तरह वह भी अन्य सुविधाओं और लाभ मिलने की आस में भटक रही हैं.

दूसरी ओर कांता के पति को भी नक्सलियों ने मुखबिर होने के शक मे मौत के घाट उतार दिया था. उन्हें भी एक लाख रुपया मुआवजा और चपरासी की नौकरी दे दी गई. कांता भी सरकार से अन्य लाभ मिलने की उम्मीद में भटक रही हैं. इसी तरह धीरेन्द्र साहू ने बताया कि उसके पिता को नक्सलियों ने मार डाला. तब उनकी पीएम रिपोर्ट के लिये पुलिस उसे लगातार घुमाती रही. पुलिस के इस रवैये से भी धीरेन्द्र नाराज हैं. 

उनका कहना है कि मुआवजा और नौकरी देकर सरकार सब कुछ भूल गई है. उन्हें आवास के अलावा, खेती की जमीन और अन्य सुविधाएं दिये जाने का भी प्रावधान है. नक्सल हिंसा के बाद भय की वजह से इनके परिवार अपना गांव और ठिकाना छोड़ दूसरी जगह रह रहे हैं. इसके लिये वे सब कोर्ट से न्याय की उम्मीद कर रहें हैं.

इन सभी मामलों पर पुलिस अधिकारियों का कहना है कि उनके पास कोर्ट से किसी तरह का कोई पत्र या नोटिस नहीं आया है. राजनांदगांव के अतिरिक्त पुलिस अधिक्षक यूबीएस चौहान ने बताया कि नक्सल हिंसा के पीड़ितों की बराबर सहायता की जा रही है. उनकी कोई समस्या हो तो वे बताएं, उस पर तत्काल कार्यवाही की जाएगी. हालांकि, ग्रामीणों का कहना हैं कि पुलिस और प्रशासन के सामने इन लोगो ने कई बार गुहार लगाई है. हर बार इन्हें नजरअंदाज किया जाता रहा है. अब देखना ये है कि हाईकोर्ट के नोटिस के बाद पुलिस और जिला प्रशासन हरकत में आता है या नहीं.