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अयोध्या में 'फैजाबाद जिंदा है'... मनु के स्थान से सनातन की पहचान मिटाने की साजिश?

DNA News: सप्तपुरी में पहले स्थान पर विराजमान अयोध्या का सनातन धर्म यानी हिंदुओं के सबसे बड़े आराध्य स्थलों में से एक है, इसके बावजूद यहां सनातन धर्म से जुड़े प्रतीकों को मिटाने की साजिश की गई. राम मंदिर का निर्माण पूर्ण हो गया, मंदिर के शिखर पर केसरिया ध्वज भी लहरा रहा है. अब अयोध्या की शेष सनातन पहचान भी सामने आनी चाहिए.

 

अयोध्या में 'फैजाबाद जिंदा है'... मनु के स्थान से सनातन की पहचान मिटाने की साजिश?

Ayodhya news: भगवान श्रीराम की नगरी अयोध्या का हिंदुओं के लिए बहुत अधिक धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है. लेकिन इसके बावजूद अयोध्या में सनातन धर्म से जुड़े प्रतीकों को मिटाने की साज़िश की गई. सनातन से इस साजिश के खिलाफ ज़ी न्यूज़ लगातार अभियान चला रहा है. इसकी गूंज सरकार के कानों तक पहुंची भी है. अपनी विशेष सीरीज़ में हम आपको बता चुके हैं कि कैसे अयोध्या की गलियों का मुस्लिम नाम रखा गया. कैसे मणि पर्वत पर शेषावतार मंदिर को मजार में बदला गया.

अब आपको अयोध्या की सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान मिटाने की उस साज़िश के तीसरे अध्याय के बारे में बताने वाले हैं. मुगलकाल के दौर में सिर्फ़ राम मंदिर को ही नहीं तोड़ा गया बल्कि हिंदू पौराणिक आस्था से जुड़े तमाम स्थलों को निशाना बनाया गया. इन्हीं में से एक मनु से जुड़ा प्रतीक भी है. जिस जगह को हिंदू मनु की नाव कहते हैं, उसे मुग़लों के दौर में मज़ार घोषित कर दिया गया. तब से मुस्लिम समुदाय इस पर अपना दावा करता है और इस पर उनका नियंत्रण भी है. वैसे मनु से जुड़ा प्रतीक मानकर यहां हिंदू भी पूजा करने आते हैं. ये हनुमानगढ़ी मंदिर से केवल 200 मीटर की दूरी पर है.

नई सृष्टि की शुरुआत की कथा

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जिस जगह की हिंदू पूजा करते हैं और मुसलमान इबादत करते हैं, उसके इतिहास का पता लगाने के लिए ज़ी न्यूज़ की टीम अयोध्या पहुंची. पहले आपको हिंदुओं के लिए इस जगह का महत्व बताते हैं. हिंदू पौराणिक मान्यताओं के अनुसार मनु को मानव जाति का आदि पुरुष यानी प्रथम मनुष्य बताया गया है. प्रलय के बाद मनु ही एकमात्र जीवित मनुष्य बचे और उन्होंने नई सृष्टि की शुरुआत की.

मान्यताओं के मुताबिक़ उनकी नाव ने दुनिया को विनाश से बचाया. हिंदुओं के अनुसार इस जगह पर मनु की वही 9 गज की नाव है. जब प्रलय आई तो हर जीव-जंतु के अंश लेकर मनु नाव पर चले और जब प्रलय खत्म हुई तो वो नौका यहीं रखी गई. बाद में इस नाव को यहां समाधि दे दी गई. इस तरह मनु से जुड़ी समाधि होने की वजह से ये हिंदुओं के लिए पूज्य है.

लेकिन जो जगह हिंदुओं के लिए मनु की नाव की समाधि है, उसे मुस्लिम नौ गजी मज़ार कहते हैं. नौ गजी यानी नौ गज के मुस्लिम संत की मज़ार. मज़ार के केयरटेकर का दावा है कि मुस्लिम संत नूह अलेह सलाम ने इंसानियत को बचाने के लिए लोगों और जीव-जंतुओं को अपनी नाव में बिठा लिया. 

आप दोनों पक्षों के दावों को नीचे वीडियो में गौर से देखिए सुनिए.

ऊपर वीडियो में आपने मजार के केयरटेकर की दलील सुनी. वो कह रहे हैं कि हजारों साल पहले मुस्लिम संत नूह अलेह सलाम ने इंसानियत की हिफ़ाज़त की. यानी हिंदू जो दावा मनु को लेकर करते हैं, ठीक उसी तरह का दावा. कहानी एक जैसी बता रहे हैं लेकिन धर्म अलग-अलग हैं. सोचिए मनु का अस्तित्व हजारों साल पुराना बताया जाता है. जबकि इस्लाम का अस्तित्व केवल 1,400 साल पुराना है. फिर हजारों साल पहले मुस्लिम संत अयोध्या में कहां से आए. आख़िर मज़ार के केयरटेकर कैसे मान लेते कि ये हिंदुओं से जुड़ा स्थल है. कैसे कह देते कि बाद में इसका रूप बदला गया. कैसे सनातन धर्म से इसके संबंध को स्वीकार कर लेते. यही कारण है कि स्वयं को सही साबित करने के लिए वो कुतर्क कर रहे हैं. ये सनातन नगरी अयोध्या में हिंदू धर्म से जुड़े पूजा-पाठ के स्थलों को मिटाकर नया रूप देने की साज़िश है. बाबर के वैचारिक वंशजों ने अयोध्या की सांस्कृतिक पहचान मिटाने की सुनियोजित साजिश की.

इसी साजिश के तहत अयोध्या की गलियों का मुस्लिम नाम रखा गया, हिंदुओं से जुड़े स्थलों को मजार का रूप दिया गया. अयोध्या की सनातन पहचान मिटाने के लिए इस्लामीकरण किया गया. राम मंदिर का निर्माण पूर्ण हो गया, मंदिर के शिखर पर केसरिया ध्वज भी लहरा रहा है. अब अयोध्या की शेष सनातन पहचान भी सामने आनी चाहिए.

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