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...तो इसलिए मायावती ने अपने चिर दुश्‍मन SP से किया तालमेल?

मायावती ने पिछले साल सहारनपुर हिंसा के बाद राज्‍यसभा से इस्‍तीफा देकर सबको हैरान कर दिया था. उसके बाद उनके फूलपुर से चुनाव लड़ने के बारे में कयास लगाए जाते रहे लेकिन उपचुनाव में पार्टी के नहीं उतरने की पुरानी रणनीति का हवाला देते हुए इन संभावनाओं को खारिज कर दिया गया.

...तो इसलिए मायावती ने अपने चिर दुश्‍मन SP से किया तालमेल?
23 साल बाद अखिलेश यादव की सपा और मायावती की बसपा ने गोरखपुर और फूलपुर उपुचनावों में तालमेल किया है.(फाइल फोटो)

एक तरफ बीजेपी जहां अभी त्रिपुरा की जीत के जश्‍न में डूबी ही थी कि दूसरी तरफ यूपी में बसपा सुप्रीमो मायावती के दांव ने उसको सतर्क कर दिया. दरअसल 11 मार्च को यूपी के गोरखपुर और फूलपुर में होने जा रहे उपचुनाव में बसपा ने सपा के साथ तालमेल की बात परोक्ष रूप से कही है. 1995 में गेस्‍ट हाउस कांड के बाद शिद्त के साथ दुश्‍मनी निभाने वाले इन दोनों दलों के बीच इस तरह के तालमेल को 2019 चुनावों की आहट के साथ सबसे बड़ा सियासी उलटफेर माना जा रहा है. कुछ राजनीतिक पंडित इसको 2015 में धुर विरोधी जदयू और राजद के एक साथ आने के बाद दूसरे बड़े संभावित महागठबंधन के रूप में देख रहे हैं.

हालांकि मायावती ने रविवार को प्रेस कांफ्रेंस में स्‍पष्‍ट कर दिया है कि यह कोई समझौता नहीं है और अपने प्रत्‍याशी नहीं उतारने के कारण बीजेपी को हराने के लिए केवल वोटों का ट्रांसफर है. लेकिन इस दावे के बावजूद इसके गहरे सियासी निहितार्थ निकाले जा रहे हैं. सियासी हलकों में माना जा रहा है कि मायावती को राज्‍यसभा में भेजने के लिए बीएसपी ने यह दांव चला है.

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राज्‍यसभा चुनाव
दरअसल 23 मार्च को 58 सीटों पर राज्‍यसभा चुनाव होने जा रहे हैं. इनमें से 10 राज्‍यसभा सीटें यूपी की हैं. राज्‍य में बीजेपी के 300 से अधिक विधायकों के कारण इनमें से 8 सीटें पार्टी को मिलनी तय हैं. बाकी दो सीटों में से एक पर बीएसपी की निगाह है. बीएसपी के पास लेकिन केवल 19 विधायक हैं और इनकी बदौलत राज्‍यसभा में पहुंचना संभव नहीं है. इसलिए समर्थन फॉर्मूले के तहत राज्‍यसभा और विधान परिषद में एक-दूसरे की मदद की बात कही गई है. यानी सपा के समर्थन से बसपा अपने एक प्रत्‍याशी को राज्‍यसभा भेजेगी और इसके बदले में बीएसपी के समर्थन से सपा विधान परिषद में अपने दो सदस्‍य भेज सकेगी.

ये केवल वोटों का ट्रांसफर है, चुनावी गठबंधन नहीं: मायावती

मायावती
मायावती ने पिछले साल सहारनपुर हिंसा के बाद राज्‍यसभा से इस्‍तीफा देकर सबको हैरान कर दिया था. उसके बाद उनके फूलपुर से चुनाव लड़ने के बारे में कयास लगाए जाते रहे लेकिन उपचुनाव में पार्टी के नहीं उतरने की पुरानी रणनीति का हवाला देते हुए इन संभावनाओं को खारिज कर दिया गया.

इस बीच लालू प्रसाद की राजद ने बिहार से उनको राज्‍यसभा में भेजने का प्रस्‍ताव दिया था, जिसे मायावती ने स्‍वीकार नहीं किया. दरअसल यूपी में बीएसपी का बड़ा जनाधार है. ऐसे में यूपी के बाहर किसी अन्‍य राज्‍य से राज्‍यसभा जाना मायावती के लिए सियासी लिहाज से उपयुक्‍त नहीं होता. इससे ऐसा संदेश जाता कि यूपी में बीएसपी का जनाधार कमजोर हुआ है और इस वजह से मायावती को उच्‍च सदन जाने के लिए दूसरे राज्‍य में किसी दूसरे दल का सहारा लेना पड़ा.

एक तीर दो निशाने
मायावती ने इस दांव के जरिये दो निशाने साधे हैं. पहला यूपी से ही उनके राज्‍यसभा जाने का रास्‍ता खुल गया है. दूसरा 2019 के आम चुनावों के लिहाज से इस तालमेल की जमीनी धरातल पर परीक्षा भी हो जाएगी. यदि नतीजे अनुकूल आए तो बीजेपी को चुनौती देने के लिए महागठबंधन तैयार हो जाएगा. कांग्रेस पहले से ही इसकी वकालत करती रही है. सो, ऐसा होने पर यूपी में सपा-बसपा और कांग्रेस मिलकर बीजेपी को चुनौती देने के लिए एक साझा मंच बना सकते हैं.

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दरअसल मौजूदा दौर में यूपी में बीजेपी के वर्चस्‍व के कारण इन तीनों दलों के पास एक-दूसरे से हाथ मिलाने की मजबूरी भी है. 2014 के आम चुनावों में बसपा का यूपी में खाता नहीं खुला. सपा में शीर्ष यादव परिवार के पांच सदस्‍य ही जीत सके और कांग्रेस को गांधी परिवार के गढ़ वाली अमेठी और रायबरेली सीट पाकर ही संतोष करना पड़ा. ऐसे में मजबूत 'मोदी लहर' को यूपी में थामने के लिए इन दलों का हाथ मिलाना रणनीति के साथ मजबूरी भी है.