DNA ANALYSIS: मुंशी प्रेमचंद के ‘खजाने’ का विश्लेषण

मुंशी प्रेम चंद के साहित्य को समय की सीमा में नहीं बांधा जा सकता. उनका जीवन और साहित्य आज भी उतना ही प्नासंगिक है, जितना पहले था.

DNA ANALYSIS: मुंशी प्रेमचंद के ‘खजाने’ का विश्लेषण

नई दिल्ली: मुंशी प्रेम चंद के साहित्य को समय की सीमा में नहीं बांधा जा सकता. उनका जीवन और साहित्य आज भी उतना ही प्नासंगिक है, जितना पहले था. आज से 140 वर्ष पहले 31 जुलाई 1880 को वाराणसी में उनका जन्म हुआ था. 

जब धनपत राय श्रीवास्तव को बनना पड़ा मुंशी प्रेमचंद
मुंशी प्रेमचंद का असली नाम धनपत राय श्रीवास्तव था. लेकिन उन्हें बदले हुए नाम के साथ लिखना पड़ा. इसकी वजह ये थी कि वर्ष 1908 में अंग्रेज़ों ने उनके पहले उर्दू कहानी संग्रह 'सोज़े वतन' को ज़ब्त कर लिया था. देशप्रेम की कहानियों की वजह से इस कहानी संग्रह की बची हुई प्रतियों को जला दिया गया था. 

मेहनत और ईमानदारी थी मुंशी प्रेमचंद की पूंजी
मुंशी प्रेमचंद ने अपनी एक मशहूर कहानी पंच परमेश्वर में लिखा था कि क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात ना कहोगे. अर्थात हमें किसी से अपने संबंध बिगड़ने के डर से ईमानदारी का रास्ता नहीं छोड़ना चाहिए. मुंशी प्रेमचंद मेहनत को सबसे मूल्यवान समझते थे. उन्होंने कहा था कि मैं एक मजदूर हूं, जिस दिन कुछ लिख ना लूं, उस दिन मुझे रोटी खाने का कोई हक़ नहीं है. वे कहते थे कि सिर्फ़ सोने और खाने का नाम जीवन नहीं है. हमें जीवन में जो कुछ भी कठिन परिश्रम और पुरुषार्थ के दम पर मिलता है. वही हमारी असली कमाई है. इसलिए हमें हमेशा मेहनत के रास्ते पर ही चलना चाहिए.

'दुनिया में विपत्ति से बड़ा शिक्षक और कोई नहीं'
मुंशी प्रेमचंद कहते थे कि दुनिया में विपत्ति से बढ़कर अनुभव सिखाने वाला. इसकी शिक्षा देने वाला कोई विद्यालय भी नहीं खुला है. जीवन में आने वाली कठिनाइयां और उनसे लड़ने की हमारी क्षमता और सामर्थ्य से ही हमारे व्यक्तित्व का निर्माण होता है. इसलिए परेशानियों से घबराइये मत बल्कि ये सोचकर चलिए कि ये परेशानियां भी आपको कुछ ना कुछ नया सिखाकर ही जाएंगी.

'चापलूसी धीमा जहर, इंसान को धीरे-धीरे मार देती है'
मुंशी प्रेमचंद कहते थे कि चापलूसी का ज़हरीला प्याला आपको तब तक नुकसान नहीं पहुंचा सकता. जब तक कि आपके कान उसे अमृत समझ कर पी ना जाएं.  जो लोग चापलूसी करते हैं और जो लोग दूसरों की चापलूसी से खुश होते हैं. उन दोनों को ही ये बात समझ लेनी चाहिए कि तारीफ़ की चाशनी में डूबा हुआ झूठ अमृत जैसा क्यों ना महसूस हो. लेकिन ये उनकी आत्मा और व्यक्तित्व को हमेशा के लिए दूषित कर देता है.

नमक के दारोगा ने दिलाई मुंशी प्रेमचंद को पहचान
मुंशी प्रेम चंद का एक बेहद मशहूर उपन्यास है. जिसका नाम है नमक का दारोगा. इसके मुख्य किरदार का नाम वंशीधर है. वंशीधर को नमक विभाग में दारोगा की नौकरी मिल जाती है. तब वंशीधर के पिता उसे समझाते हैं कि मासिक वेतन तो पूर्णमासी का चाँद है, जो एक दिन दिखाई देता है और घटते-घटते लुप्त हो जाता है. ऊपरी आय बहता हुआ स्रोत है जिससे सदैव प्यास बुझती है. वेतन मनुष्य देता है, इसीलिए उसमें वृद्धि नहीं होती. ऊपरी आमदनी ईश्वर देता है. इसी से उसकी बरकत होती हैं. तुम स्वयं विद्वान हो, तुम्हें क्या समझाऊं. लेकिन वंशीधर विद्वान होने के साथ साथ ईमानदार भी था. वो पूरी ईमानदारी से नौकरी करता है. जिसके चलते उसे साजिश रचकर जल्दी ही नौकरी से निकाल दिया जाता है. लेकिन इलाके का ज़मीनदार वंशीधर की ईमानदारी से प्रभावित हो जाता है और आख़िर में उसे एक बड़ा पद दे देता है 

बच्चों को ईमानदार और पक्के इरादों वाला बनाना चाहते थे प्रेमचंद
मुंशी प्रेमचंद बताते हैं कि अगर आप ईमानदारी से अपना कर्तव्य निभाते हैं तो उसका फल देर से ही सही लेकिन मिलता ज़रूर है. मुंशी प्रेमचंद ना सिर्फ़ खुद लालसा और लालच से परे रहना चाहते थे बल्कि वो अपने बच्चों को भी ईमानदार और पक्के इरादों वाला बनाना चाहते थे । ये मुंशी प्रेम चंद का वो न्यूनतम आवश्यकता वाला फ़ॉर्मूला था, जिस पर आज देश की युवा पीढ़ी को चलना चाहिए.

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