यंगून: जहां हिंदुस्‍तान के अंतिम मुगल बादशाह की कब्र है...

भारत के लिहाज से दक्षिण पूर्व एशिया का प्रवेश द्वार कहे जाने वाले म्‍यांमार की यात्रा पर मंगलवार को पीएम मोदी जाएंगे. 

यंगून: जहां हिंदुस्‍तान के अंतिम मुगल बादशाह की कब्र है...
यंगून में बहादुर शाह जफर की मजार

यंगून: भारत के लिहाज से दक्षिण पूर्व एशिया का प्रवेश द्वार कहे जाने वाले म्‍यांमार की यात्रा पर मंगलवार को पीएम मोदी जाएंगे. दरअसल एक दौर में भारत का हिस्‍सा रहे म्‍यांमार के साथ हमारे सदियों पुराने ऐतिहासिक और सांस्‍कृतिक संबंध हैं. औपनिवेशिक दौर में 19वीं सदी में तीन आंग्‍ल-बर्मा युद्ध के बाद यह ब्रिटिश भारत का एक प्रांत बन गया. उस दौर में म्‍यांमार को बर्मा कहा जाता था और इसकी राजधानी रंगून थी. रंगून को अब यंगून कहा जाता है. गुलामी के उस दौर में 1857 के प्रथम स्‍वतंत्रता संग्राम के बाद हिंदुस्‍तान के अंतिम मुगल बादशाह को निर्वासन के तहत यंगून ही भेजा गया था.

उसके बाद उनका हिंदुस्‍तान लौटना कभी नसीब नहीं हुआ और अब यंगून में उनकी मजार है. कमोबेश उसी तरह हार के बाद बर्मा के अंतिम शासक को भी भारत के रत्‍नागिरी भेज दिया गया. उनको भी दोबारा अपने मुल्‍क लौटना मयस्‍सर नहीं हुआ. इस तरह दोनों शासक अपने मुल्‍कों में वापस कभी नहीं लौट पाए.

म्‍यांमार बौद्ध धर्म को मानने वाला देश है. यहां की करीब 90 प्रतिशत आबादी बौद्ध धर्म की अनुयायी है. बौद्ध धर्म की शुरुआत भारत से ही हुई थी. इस लिहाज से दोनों मुल्‍कों के बीच सांस्‍कृतिक संबंध सदियों से हैं. संभवतया इसी कारण 1927 में अखिल भारतीय कांग्रेस ने एक प्रस्‍ताव पारित किया था कि म्‍यांमार को भारत का हिस्‍सा बने रहना चाहिए लेकिन बाद में उसको वापस ले लिया गया.

1937 में हालांकि यह अलग हो गया. आखिरकार 1948 में म्‍यांमार को ब्रिटिश राज से मुक्ति मिली और उसके बाद भारत ने उसके साथ कूटनयिक संबंध स्‍थापित किए. 

(म्‍यांमार से कार्तिकेय शर्मा की रिपोर्ट)