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सबसे पहले देश

नागरिक के तौर पर केवल अधिकारों की ही मांग न करें, बल्कि अपने कर्तव्यों का भी पालन करें

सबसे पहले देश

डॉ. सुभाष चंद्रा

हमने 9 अगस्त 2017 को गांधीजी की ओर से चलाए गए 'भारत छोड़ो' आंदोलन के 75 वर्ष पूर्ण होने को सेलिब्रेट किया. हमने संसद के ऊपरी सदन में एकमत से प्रस्ताव पास कर देश की आजादी के लिए अपना जीवन कुर्बान करने वाले लाखों देशवासियों और आजादी की लड़ाई में आगे बढ़कर हिस्सा लेने वाले हजारों देशभक्तों के प्रति आभार व्यक्त किया. प्रस्ताव में यह भी कहा गया कि हम आने वाले समय में भारत को गरीबी से आजादी दिलाने, स्वच्छता, धर्म निरपेक्षता को और मजबूत करने का संकल्प लेते हैं. मैं रखे गए प्रस्ताव पर सदन के सम्मानित सदस्यों को अपनी बात रखते हुए देख रहा था. अधिकांश सदस्य अपनी पार्टी की विचारधारा/विश्वास के अनुसार बोल रहे थे. उन्होंने अपनी भाषण कला से आज के राजनीतिक हालात पर गंभीर चिंता व्यक्त की. कुछ सदस्यों ने बताया कि कैसे उनके पूर्वजों ने स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा लिया.

शायद ही किसी ने देश की आजादी लिए कुर्बान हुए चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह जैसे लोगों को याद किया. न ही किसी ने वर्तमान हालात पर चिंता व्यक्त की. इससे यह पता चलता है कि हममें (न सिर्फ सदन में उपस्थित सदस्य बल्कि समाज में) से प्रत्येक व्यक्ति आत्मकेंद्रित है, कोई देश के बारे में नहीं सोचता है. आइए हम जिन्हें याद कर रहे हैं, उनके जैसे ही अपने आप किसी भी बलिदान के लिए तैयार रहें ताकि लोग याद करें. आज हममें से हर कोई सवाल पूछता है, मुझे इसमें क्या मिलेगा? या मुझे इससे क्या फायदा होगा? यह मेरा काम नहीं है, मैं क्यों अपनी जान जोखिम में डालूं. इत्यादि इत्यादि.

क्या आपको यह याद है, कि हमें आजादी दिलाने वालों ने कभी भी यह नहीं पूछा, 'मुझे यह बलिदान क्यों करना चाहिए?' 70वें स्वतंत्रता दिवस पर देशवासियों को मेरी तरफ से बधाई. ईश्वर आप सभी को स्वस्थ, समृद्ध और खूश रखे. लेकिन मैं आप सभी को साथ में अपने परिवार के सदस्यों को किसी भी तरह की गुलामी के खिलाफ आगाह करना चाहता हूं. हम जो कर रहे हैं वह खुदगर्जी है. हम आत्म-तुष्टीकरण की तरफ बढ़ रहे हैं.यह हमें अलग तरह से बीमार बना रहा है, और बहुत कुछ. यह हमारे समाज को दुखी बना देगा.

आइए, सपनों का भारत बनाने के लिए हम मिलकर काम करें. स्वतंत्र भारत आज 70 साल का हो चुका है, लेकिन दुनिया के देशों की गिनती में भारत एक युवा देश है. मेरा विश्वास है कि यहां हर हजार बच्चों में से दोबच्चे ऐसे होते हैं जो असाधारण प्रतिभा वाले होते हैं. ये दो बच्चे हरियाणा के किसी छोटे से गांव के हो सकते हैं. तेलंगाना से भी हो सकते हैं. जो अवसर या विकल्प दिल्ली या मुंबई के युवाओं को मिलते हैं, वह इन्हें नहीं मिल पाते. फिर भी इन परेशानियों के बावजूद ये खुशहाल रहते हैं और मजबूती के साथ समस्याओं का सामना करते हैं. मैं जिस भारत की कल्पना करता हूं ये उसके प्रतीक हैं, जो मुस्कराते रहते हैं, बहादुर होते हैं और अपनी किस्मत के हर उतार-चढ़ाव का लगन और कर्तव्यनिष्ठा के साथ सामना करते हैं.

कोई भी मुल्क सही मायनों में नागरिकों के आपसी संबंधों के बिना राष्ट्र नहीं बन सकता. आज हम 1.25 अरब लोग हैं. भारतीय होना हमारे लिए सबसे बड़ा धर्म है और देश सबसे बड़ा मंदिर. भारत आज आजादी की70वीं वर्षगांठ मना रहा है. ऐसे समय में हमें बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक के बीच चल रहे विवादों को सुलझाना होगा. हमारे पास कई ऐसी उपलब्धियां हैं जो हमें दुनिया में टॉप पर पहुंचा सकती हैं. लेकिन सबसे पहले बहुसंख्यकों और अल्पसंख्यकों के बीच एक सामाजिक मुद्दा जो टकराव का कारण बनता है, उसे हल करना होगा. मेरा यह मानना है कि यदि एक देश में बहुसंख्यकों की आबादी ही खुद को असुरक्षित महसूस करे तो ऐसे में अल्पसंख्यकों की आबादी कभी भी सुरक्षित नहीं हो सकती. 

एक ऐसी अर्थव्यस्था जिसमें सभी का विकास निहित हो: हम एक ऐसा राष्ट्र बनाएं जहां मांग और आपूर्ति में कोई अंतर न हो. एक ऐसा समाज बनाएं, जिसमें भरोसा हो, विश्वास हो, न कि अविश्वास और असुरक्षा. मेराभरोसा है कि प्रतिस्पर्धात्मक माहौल में योग्य ही प्रतिस्पर्धा में रहे. लेकिन ऐसे समय में जब कहा जा रहा है कि 70 फीसदी की आबादी की संपत्ति पर 1 फीसदी आबादी का कब्जा है. या ये कहा जाए कि 10 फीसदीआबादी ने 90 प्रतिशत आबादी (2000-2015 के डाटा के अनुसार) की संपदा पर कब्जा किया हुआ है. ये स्वीकार्य नहीं है. दरअसल ये हमारे समाज में फैले भ्रष्टाचार का परिणाम है. मेरे हिसाब से भ्रष्टाचार सिर्फ रिश्वत का लेनदेन ही नहीं है. भ्रष्टाचार तब भी होता है जब हम एक-दूसरे का समय नष्ट करते हैं. जब हम कहते हैं, 'चलता है', जब हम कहते हैं 'मुझे क्या'. 

हम प्रधानमंत्री के साथ प्रतिज्ञा लें और जो वह देश के लिए हासिल करना चाहते हैं, उसमें सहायता करें. मेरा मानना है वह जो चाहते हैं उसे अकेले 5 प्रतिशत से ज्यादा हासिल नहीं कर सकते हैं. हममें से सभी को इनवादों और प्रतिज्ञाओं के अंदर से देखना होगा और उसके बाद हमें अपने कार्यों की तुलना करनी होगी. अगर हमारे प्रयास विपरीत दिशा में होंगे तो हमें हमारे हितों की बलि देनी पड़ेगी. हमें और भी बहुत कुछ चीजों काबलिदान देना होगा.

आइए, हम अपने अधिकारों की मांग करने की बजाए कर्तव्यों को समझें. आइए हम अपने उन पूर्वजों का अनुसरण करें, जिन्होंने अपने देश के लिए फर्ज निभाते हुए कभी ये नहीं कहा-  'मुझे ये क्यों करना चाहिए'.

स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं
जय हिंद-जय भारत
वंदे-मातरम्
(लेखक राज्यसभा सांसद और एस्सेल ग्रुप के चेयरमैन हैं)

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