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सीजेआई का रविशंकर प्रसाद पर पलटवार, कहा- मौलिक अधिकारों के साथ नहीं हो सकता कोई समझौता

सीजेआई ने कहा कि उच्चतम न्यायालय ‘संवैधानिक संप्रभुता’ में विश्वास करता है और उसका पालन करता है.

सीजेआई का रविशंकर प्रसाद पर पलटवार, कहा- मौलिक अधिकारों के साथ नहीं हो सकता कोई समझौता
राष्ट्रीय विधि दिवस के मौके पर आयोजित कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ सीजेआई दीपक मिश्रा. (PTI/26 Nov, 2017)

नई दिल्ली: प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) दीपक मिश्रा ने रविवार (26 नवंबर) को कहा कि नागरिकों के मौलिक अधिकारों के साथ कोई समझौता नहीं हो सकता है. यह बात उन्होंने केंद्रीय विधि मंत्री रविशंकर प्रसाद की इस दलील का जवाब देते हुए कही जिसमें उन्होंने कहा था कि शासन का काम ‘उनके पास रहना चाहिये’ जो शासन करने के लिये निर्वाचित किये गए हों. प्रसाद ने कहा था कि ‘जनहित याचिका शासन का विकल्प’ नहीं बन सकती है. इसपर सीजेआई ने कहा कि उच्चतम न्यायालय ‘संवैधानिक संप्रभुता’ में विश्वास करता है और उसका पालन करता है.

उन्होंने कहा, ‘‘मौलिक अधिकार संविधान के मूल मूल्यों में हैं और वे संविधान का मूल सिद्धांत हैं. एक स्वतंत्र न्यायपालिका को न्यायिक समीक्षा की शक्ति के साथ संतुलन स्थापित करने के लिये संविधान के अंतिम संरक्षक की शक्ति दी गई है, ताकि इस बात को सुनिश्चित किया जा सके कि संबंधित सरकारें कानून के प्रावधान के अनुसार अपने दायरे के भीतर काम करें.’’ संविधान दिवस मनाने के लिये शीर्ष अदालत द्वारा आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि नागरिकों के मौलिक अधिकार के साथ कोई समझौता नहीं हो सकता.

न्यायमूर्ति मिश्रा ने कहा, ‘‘नागरिकों का अधिकार सर्वोच्च होना चाहिये.’’ संविधान को ‘स्पष्ट’ और जीवंत दस्तावेज बताते हुए उन्होंने कहा, ‘‘उच्चतम न्यायालय का आज मानना है कि हम सिर्फ संवैधानिक संप्रभुता के तहत हैं और हमें इसका पालन करना चाहिये.’’ सीजेआई ने कार्यक्रम में कहा, ‘‘यद्यपि कोई भी अधिकार पूर्ण नहीं है, लेकिन ऐसी कोई बाधा नहीं होनी चाहिये जो संविधान के मूल सिद्धांतों को नष्ट करे.’’ इस कार्यक्रम का उद्घाटन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने किया.

न्यायमूर्ति मिश्रा ने कहा कि न्यायपालिका का ध्यान लंबित मामलों को कम करने, महत्वहीन मुकदमों को खारिज करने और मामलों का निपटारा करने के लिये वैकल्पिक विवाद समाधान तंत्र पर जोर देने पर होना चाहिये. कार्यक्रम में विधि मंत्री ने कहा कि यद्यपि जनहित याचिका गरीबों को न्याय प्रदान करने में उद्देश्यों की पूर्ति करती है, लेकिन उसका इस्तेमाल शासन के विकल्प और कार्यपालिका और विधायिका की कानून बनाने की शक्तियों के विकल्प के तौर पर नहीं किया जा सकता है. प्रसाद ने कहा, ‘‘जनहित याचिकाएं शासन और सरकार का विकल्प नहीं बननी चाहिये क्योंकि हमारे संस्थापकों ने यह अधिकार उन्हें दिया है जो शासन करने के लिये निर्वाचित हुए हों.’’