अब कांग्रेस अध्यक्ष नहीं होगा जलियांवाला बाग मेमोरियल ट्रस्ट का सदस्य

संशोधन बिल के मुताबिक़ संसद में सबसे बड़े दल या विपक्षी दल के नेता को ट्रस्ट का सदस्य बनाया जाएगा. कांग्रेस ने राज्यसभा में पुरज़ोर विरोध किया और कहा कि ट्रस्ट और कांग्रेस अध्यक्ष का नाता ख़ून और नाख़ून जैसा रहा है.

अब कांग्रेस अध्यक्ष नहीं होगा जलियांवाला बाग मेमोरियल ट्रस्ट का सदस्य
जलियांवाला बाग मेमोरियल ट्रस्ट संशोधन बिल राज्यसभा में पास.

नई दिल्ली: जलियांवाला बाग मेमोरियल ट्रस्ट संशोधन बिल राज्यसभा में पास हो गया है. अब कांग्रेस अध्यक्ष इस ट्रस्ट का सदस्य नहीं होगा. ये बिल लोकसभा से पिछले सत्र में ही पास हो चुका है. संशोधन बिल के मुताबिक़ संसद में सबसे बड़े दल या विपक्षी दल के नेता को ट्रस्ट का सदस्य बनाया जाएगा. कांग्रेस ने राज्यसभा में पुरज़ोर विरोध किया और कहा कि ट्रस्ट और कांग्रेस अध्यक्ष का नाता ख़ून और नाख़ून जैसा रहा है.

जलियांवाला बाग नेशनल मेमोरियल ऐक्ट, 1951 के तहत ट्रस्ट को मेमोरियल के निर्माण और प्रबंधन का अधिकार है. इसके अलावा इस ऐक्ट में ट्रस्टियों के चयन और उनके कार्यकाल के बारे में भी बताया गया है. अब तक कांग्रेस अध्यक्ष मेमोरियल के ट्रस्ट का पदेन सदस्य रहा है, लेकिन अब संशोधन विधेयक में इसे बदलने की तैयारी है. अब लोकसभा में नेता विपक्ष को ट्रस्ट का सदस्य बनाने का प्रावधान रखा गया है. सदन में विपक्ष का नेता नहीं होने की स्थिति में सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता को यह जगह दी जाएगी.

नए विधेयक में केंद्र सरकार को अधिकार दिया गया है कि वह ट्रस्ट के किसी सदस्य को उसका कार्यकाल पूरा होने से पहले ही हटा सकती है. इससे पहले 2006 में यूपीए सरकार ने ट्रस्ट के सदस्यों को 5 साल का तय कार्यकाल देने का प्रावधान किया था. फिलहाल पीएम नरेंद्र मोदी इस ट्रस्ट के मुखिया हैं. उनके अलावा इस ट्रस्ट में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी, संस्कृति मंत्री और लोकसभा में नेता विपक्ष शामिल हैं. इसके अलावा पंजाब के सीएम भी ट्रस्टी हैं.

जलियांवाला बाग राष्ट्रीय स्मारक के ट्रस्ट के अध्यक्ष प्रधानमंत्री होते हैं. अभी तक इसके ट्रस्टियों में कांग्रेस अध्यक्ष, संस्कृति मंत्री, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष, पंजाब के राज्यपाल, पंजाब के मुख्यमंत्री सदस्य हैं. जलियांवाला बाग में 13 अप्रैल, 1919 को कर्नल आर. डायर की अगुआई में ब्रिटिश सैनिकों ने निहत्थे हजारों लोगों पर गोलियां चलाई थीं जिनमें बड़ी सख्या में लोग मारे गए थे. इसी घटना की याद में 1951 में स्मारक की स्थापना की गई थी.

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