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नए लर्निंग मॉडल से स्कूली शिक्षा के तौर-तरीके बदलने की पहल

नए लर्निंग मॉडल से स्कूली शिक्षा के तौर-तरीके बदलने की पहल

प्र. आप की संस्था एक्सीड एजुकेशन किस तरह की ट्रेनिंग से शिक्षा व्यवस्था में सुधार लाने का काम कर रही है.

उ. देखिए, सच्चाई ये है कि काम की दुनिया बदल चुकी है, लेकिन स्कूलों की दुनिया वैसी ही रह गई है जैसी पहले थी. इससे प्रमुख समस्या बच्चों को ये आ रही है कि जब वो काम करने जाते हैं तो जो स्किल्स (कौशल) उन्हें स्कूल में मिलते है वो काम नहीं आते. आज के दौर में राज्यों की राजधानियां याद करने, पहाड़े रटने से कोई ज्यादा फर्क नहीं हो रहा है. आप गूगल पर जाकर कुछ भी खोज सकते हैं. सवाल है कि नौकरियां किसको मिल रही हैं? तो जवाब है कि नौकरियां उसको मिल रही है जो परेशानी का हल निकाल सकता है. जिसको विश्वास है कि वो किसी समस्या का हल ढूंढ़ सकता है. जो कम्यूनिकेट कर सकता है. ऐसी चीजें स्कूलों में नहीं सिखाई जा रही हैं. सरकार हाई स्कूल और कॉलेज शिक्षा में राष्ट्रीय कौशल विकास कार्यक्रम के जरिए बदलाव के लिए कोशिशें कर रही हैं. लेकिन इसमें बहुत देरी हो जाती है. तो हमारा उद्देश्य ये है कि जब तक प्राथमिक शिक्षा में ऐसे बदलाव नहीं आएंगे तब तक ये बच्चों के लिए जीवनभर की हानि होगी. बेसिक एजुकेशन में दी जाने वाली शिक्षा को रट्टे से, ब्लैक बोर्ड से कॉपी करने से और टीचर के डर से मुक्त कर ऐसा बनाया जाए कि हर बच्चे को बोलने का मौका मिले, एक्टिविटी और एक्सपेरिमेंट करने का मौका मिले. बच्चा अपनी भाषा में लिखे, जिसको फैंसी भाषा में 21st सेंचुरी एजुकेशन कहते है. हमारा उद्देश्य है कि ऐसी शिक्षा भारत के साधारण स्कूल में दी जानी चाहिए. 

प्र. आपकी संस्था की शुरुआत कहां से हुई और प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में इस तरह से बदलाव के क्या नतीजे सामने आए हैं.   

उ. देखिए, मैं दिल्ली के एक मध्यम वर्गीय परिवार से आता हूं, मैंने विदेश में 8-10 साल कॉरपोरेट जगत में काम किया. मेरी बेटी के जन्म के बाद मुझे लगा कि मुझे वापस हिंदुस्तान जाकर शिक्षा के क्षेत्र में कुछ काम करना चाहिए. लेकिन मुझे इसके बारे में ज्यादा कुछ पता नहीं था. सबसे पहले मैंने हॉवर्ड यूनिवर्सिटी जाकर एमएड (मास्टर्स ऑफ एजुकेशन) किया. 4-5 साल तक हमने कई तरह की कोशिशें की. लेकिन फिर हमें पता चला कि जब तक आप टीचर को प्रतिदिन अच्छा पढ़ाने के लिए इनपुट नहीं देंगे, तब तक कोई बदलाव नहीं आने वाला है. तो उसी से मेरी संस्था एक्सीड एजुकेशन शुरू हुई. मैं खुद पार्ट टाइम टीचर बना. मैंने चौथी क्लास को साइंस पढ़ाया. तब मुझे समझ में आया कि ये बड़ा मुश्किल काम है. 40-50 बच्चे एक क्लास रूम में 45 डिग्री तापमान में बैठे है. कोई बच्चा बैठा रहता है, कोई बाहर भाग जाता है, कोई मुंह नहीं खोलता, कोई सुबह मार खाकर आया है. इन सबको कैसे पढ़ाया जाए? कैसे पढ़ाया जाए कि सबको समझ में आए. किसी की समझ तेज है, किसी की कम समझ है? तब जाकर समझ में आया कि इसके हिसाब से प्लान बनाना पड़ेगा हर पाठ का और उसके हिसाब से टीचर को ट्रेनिंग देनी पड़ेगी. सारी किताबें और अन्य संसाधन भी उसी के आधार पर बनेंगे और इनका मूल्यांकन और जांच भी उसी के आधार पर होगी. तो हमारी भाषा में इसे फाइव स्टेप ऑफ लर्निंग यानि सीखने के पांच कदम कहा जाता है. हमारी इस यात्रा को अब तक आठ साल हो चुके है और हमसे 10 लाख बच्चे जुड़े हैं. 

प्र. नए मॉडल से पढ़ाने के बाद बच्चों में क्या फर्क देखने को मिला?  

उ. एक्सीड की क्लास में 6 से 9 महीने पढ़ने के बाद ये फर्क दिख जाता है कि बच्चा अंग्रेजी में ज्यादा बोलने लगता है. इसमें कोई जादू नहीं है, ऐसा इसलिए होता है क्योंकि हमारी क्लास में बच्चे को बोलने का मौका ज्यादा मिलता है. क्लास में केवल टीचर ही 40 मिनट नहीं बोलते हैं, यहां 20 मिनट बच्चा बोलता है. दूसरा बदलाव ये हुआ है कि बच्चों की क्यूरियोसिटी यानि जानने की इच्छा बढ़ जाती है, घर में मेहमान आए तो बच्चा डरा नहीं. बच्चा फोन पर बोल लेता है, अपना होमवर्क खुद करता है, बच्चे अपनी भाषा में लिखते है, किसी की नकल नहीं करते. ये सब कुछ हमारे शुरुआती नतीजे हैं और ये काफी सकारात्मक है. हम चाहते हैं ज्यादा से ज्यादा स्कूलों में ये लागू हो. 

प्र. सुना है कि आपका एक फाइव स्टेप लर्निंग मॉडल है. जिसके आधार पर आप एक नई तरीके की शिक्षा नीति की तरफ ले जा रहे हैं. आपका ये फाइव स्टेप लर्निंग मॉडल क्या है?
 
उ. फाइव स्टेप मॉडल का मकसद है बच्चा पढ़ाई के साथ-साथ सीखे भी. बच्चा जब स्कूल से घर आता है तो माता-पिता बच्चे से पूछते हैं कि आज क्या पढ़ा? वो ये नहीं पूछते हैं कि आज क्या सीखा? इसका मकसद है कि टीचर ऐसे पढ़ाएं कि बच्चा समझे और सीखे. हमारे फाइव स्टेप मॉडल का पहला स्टेप उद्देश्य है, यानि आज हम क्या सीखेंगे. दूसरा है एक्टिविटी जिसमें बच्चों की भागीदारी होती है, तीसरा स्टेप है एनालिसिस यानि विश्लेषण जिसमें बच्चे खुद ये देखेंगे कि ऐसा क्यों हुआ? इसके बाद चौथा स्टेप है लेखन इसमें तीनों स्टेप्स को लिखना है. पांचवां स्टेप है असेसमेंट यानि मूल्यांकन. इस स्टेप में बच्चों से प्रश्न पूछा जाता है, जिससे पता लगता है कि बच्चों ने क्या सीखा, यदि नहीं सीख पाएं हैं तो अगली बार फिर से कोशिश की जाएगी. इससे पता चलेगा कि पहले स्टेप में जो उदेश्य था उस तक हम पहुंचे हैं या नहीं. 

प्र. प्रशिक्षण आधारिक प्राथमिक शिक्षा की यह प्रणाली, क्या केवल प्राइवेट स्कूलों और प्राइवेट शैक्षणिक संस्थाओं तक सीमित है.  

उ. हमारा लक्ष्य है कि हर बच्चे तक हमारे नए मॉडल का एजुकेशन पहुंचे. अभी तक हम प्राइवेट स्कूलों तक ही पहुंचे हैं. हमने शुरू में सरकारी स्कूलों में पहुंचने कि कोशिश की, लेकिन वहां बहुत सारी दिक्कतों के चलते काम नहीं हो पाया. इसलिए हमने सोचा कि मध्यम वर्गीय और निम्न मध्यम वर्गीय स्कूलों के साथ शुरू करें, जहां इनकी जरूरत भी है. इसलिए छोटे शहरों के प्राइवेट स्कूलों तक हम पहुंचे हैं. लेकिन हमारी कोशिश रहेगी कि हम हर बच्चे तक इस तरह की शिक्षण प्रणाली को पहुंचाए. 

प्र. भारत में किन-किन स्कूलों के साथ किन-किन राज्यों में काम कर रहे हैं. उनके कैसे नतीजे सामने आए हैं.  

उ. हम भारत के 15-16 राज्यों के 200 शहरों तक पहुंच चुके हैं. इन शहरों के 3000 स्कूलों के साथ मिलकर हम काम कर रहे हैं. इन सभी शहरों में हम प्राइवेट स्कूलों के साथ जुड़े हैं. कुल मिलाकर हम कह सकते हैं कि हमारे साथ लगभग 10 लाख बच्चे जुड़े हैं. हमारी कोशिश है कि हम अगले तीन साल में 10 हजार स्कूलों तक पहुंचें. 

प्र. भारत सरकार के सर्व शिक्षा अभियान के तहत साथ आप अपनी मुहिम को किस स्तर तक जोड़ पाएं हैं. केंद्र और राज्य सरकारों का अभी तक का इसमें कितना सहयोग मिला. 

उ. हम अभी तक सरकार के साथ ज्यादा काम नहीं कर पाए हैं, हो सकता है कि इसमें हमारी कमी हो. शुरुआत में जब मैं इस काम के लिए हिंदुस्तान वापस लौटा था तब मैंने कोशिश की थी. लेकिन हमें ज्यादा सफलता नहीं मिली. लेकिन हम सरकार के साथ मिलकर काम करना चाहते हैं हम कोशिशों में लगे हैं. 

प्र. भारत जैसे विकासशील देश में जहां सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक कई तरह की असमानताएं हैं. ऐसे में वर्तमान शिक्षा-व्यवस्था में ही आमजन की पूरी भागीदारी नहीं हो पाती है. शिक्षा व्यवस्था में सुधार का आपका मॉडल कैसे जनता तक पहुंचेगा और कैसे वो इसका लाभ ले सकेंगे. 

उ. मैं यहां आपसे असहमत हूं, आज के समय में स्कूलों तक पहुंच कि समस्या लगभग खत्म हो चुकी है. 20-25 साल पहले हम ऐसा कह सकते थे कि गरीब व्यक्ति तक शिक्षा नहीं पहुंच रही है. लेकिन आज के समय में ऐसा नहीं है, सभी तक शिक्षा पहुंच रही है. जहां शिक्षा नहीं पहुंची है, उसके लिए हम क्या कर सकते है? ये सरकार का काम है. लेकिन जहां शिक्षा पहुंची है, हम वहां सुधार करने की कोशिशों में हैं. हम छोटे शहरों के स्कूलों से जुडें हैं. हम अर्ध ग्रामीण इलाकों तक पहुंचे हैं, खासकर दक्षिण भारत में. हम आने वाले सालों में और भी रिमोट एरिया तक पहुंचेंगे.   

प्र. ट्रेनिंग बेस्ड एलिमेंट्री एजुकेशन यानि प्रशिक्षण आधारित प्राथमिक शिक्षा का लाभ लेने पर अभिवावकों को प्रति बच्चे पर कितना खर्च करना होता है?   

उ. एक्सीड का बहुत ही सस्ता प्रोग्राम है. ये लगभग 75 से 100 रुपये प्रतिमाह से शुरू होता है. इसमें किताबें भी दी जाती है. इसके दो वर्जन होते है, एक प्राइम कहलाता है और एक फ्यूचर होता है. जो राज्य बोर्ड के स्कूल होते हैं वो फ्यूचर के साथ चलते हैं, जो सीबीएसई के स्कूल हैं वो प्राइम के साथ चलते हैं. 

प्र. क्या स्कूल अपने टाइम-टेबल में आपकी संस्था के लिए अलग से क्लास रखते हैं.
 
उ. नहीं, इसमें अलग से कुछ भी नहीं है, अभी तक स्कूलों में जो भी पढ़ाया जा रहा है वो पब्लिशर के हिसाब से पढ़ाया जा रहा है. हमारी अपनी किताबें हैं, हम अपनी किताबों के आधार पर बच्चों को पढ़ाते हैं. हमारी 1000 शीर्षक की पब्लिशिंग है. नर्सरी से लेकर 8वीं क्लास तक के बच्चों के लिए हम अपनी किताबों को राज्यों से संबंधित बोर्ड के कोर्स के हिसाब से तैयार करते हैं.

प्र. नया लर्निंग मॉडल आधारित शिक्षा ग्रहण करने पर छात्र को संबंधित बोर्ड के कोर्स की पढ़ाई से पिछड़ने का खतरा तो नहीं बना रहता है. 

उ. नहीं, हमारे पांच वर्जन है, हमारा सीबीएसई वर्जन है, आईसीएसई वर्जन है, तमिलनाडु शिक्षा बोर्ड वर्जन है, आंध्र बोर्ड वर्जन है और महाराष्ट्र शिक्षा बोर्ड वर्जन भी है. हम बच्चों को वो सब कुछ सिखाते हैं जो इन बोर्डों के कोर्स में होता है. चौथी क्लास में सब बच्चे भाग पढ़ते हैं, पांचवी क्लास में सब बच्चे सिंपल मशीन पढ़ते हैं, मुगल इतिहास सब बच्चे पढ़ते हैं. तो इसलिए यहां हमें ये समझने की जरूरत है कि बोर्ड से कोई ज्ञान में बदलाव तो नहीं होता है. जो कुछ भी ऊपर-नीचे होता है हम उसका वर्जन बना देते हैं. 

प्र. भारत में कई ऐसे बच्चे हैं जो सामान्य बच्चों के तरह शिक्षा नहीं ग्रहण कर पाते है, उनका मानसिक विकास अन्य बच्चों की तुलना में धीमा रहता है. ऐसे बच्चों तक ये शिक्षा प्रणाली पहुंचे उसके लिए आप क्या कदम उठा रहे हैं? 

उ. हमारी शिक्षा प्रणाली ऐसे बच्चों के लिए काफी कारगर है. लेकिन हम अभी वहां तक पहुंच नहीं पाए हैं कि हम ऐसे बच्चों के लिए कोई पाठ्यक्रम बनाएं. लेकिन मैं चाहता हूं स्पेशल एबिलिटी बच्चों के लिए अगले तीन-चार साल में कोई पाठ्यक्रम तैयार करें. क्योंकि ऐसे बच्चों में सीखने की क्षमता है. देखा जाए तो इन बच्चों में कोई कमी नहीं है, हमारी कमी है कि हम उन बच्चों तक पहुंच नहीं पा रहे हैं. हमारी कोशिश रहेगी कि हम इन बच्चों तक पहुंचें.

(एक्सीड एजुकेशन के फाउंडर एंड सीईओ आशीष राजपाल के साथ बातचीत पर आधारित)