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एंटी शिप मिसाइलों की रेस में कहां खड़ा है भारत, समझिए दुनिया में कैसे बदल रहा नेवल वॉर का पैटर्न

एंटी-शिप मिसाइलों की तेजी से बढ़ती क्षमताएं अब वैश्विक नौसैनिक युद्ध (Naval Battle) की रणनीतियों और शक्ति संतुलन को पूरी तरह बदल रही हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि ये मिसाइलें आधुनिक नौसैनिक शक्ति की अहम कड़ी बन चुकी हैं. एंटी-शिप मिसाइलें ऐसे हथियार हैं जो खास तौर पर युद्धपोतों और नौकाओं को निशाना बनाने के लिए तैयार की जाती हैं.

 

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एंटी-शिप मिसाइलों की तेजी से बढ़ती क्षमताएं अब दुनिया भर में नौसैनिक युद्ध (Naval Battle) की रणनीतियों और शक्ति संतुलन को नया रूप दे रही हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि ये मिसाइलें आधुनिक नौसैनिक शक्ति की रीढ़ बनती जा रही हैं. बता दें, एंटी-शिप मिसाइलें वे हथियार हैं जो विशेष रूप से युद्धपोतों और नौकाओं को नष्ट करने के लिए डिजाइन किए गए हैं. इन्हें जहाजों, विमानों, पनडुब्बियों या जमीन से दागा जा सकता है. ये मिसाइलें समुद्र की सतह के बेहद पास उड़ान भरती हैं ताकि रडार सिस्टम इन्हें पकड़ न सके.

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एंटी शिप मिसाइलों का इतिहास काफी पुराना है. पहली एंटी-शिप मिसाइलें द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान सामने आई थीं, जब नाजी जर्मनी ने रेडियो-निर्देशित हथियार विकसित किए थे. इसके बाद से मिसाइल तकनीक में लगातार सुधार होता गया. आज की मिसाइलें सुपरसोनिक या हाइपरसोनिक गति से उड़ान भर सकती हैं, जिससे उनका पता लगाना और उन्हें रोकना बेहद कठिन हो गया है.

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भारत-रूस द्वारा संयुक्त रूप से विकसित ब्रह्मोस मिसाइल इसका एक जबरदस्त उदाहरण है, जो मैक-3 से भी अधिक गति से उड़ सकती है और 400 किलोमीटर से ज्यादा दूरी तक सटीक वार कर सकती है. आधुनिक एंटी-शिप मिसाइलें GPS, रडार सीकर्स, इन्फ्रारेड होमिंग और एआई-आधारित नेविगेशन सिस्टम से लैस होती हैं. कुछ मिसाइलें दुश्मन को चकमा देने के लिए झुंड में मिलकर हमला करने में भी सक्षम हैं.

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इन मिसाइलों के बढ़ते खतरे ने दुनियाभर की नौसेनाओं को अपनी रणनीतियों पर फिर से विचार करने के लिए मजबूर कर दिया है. अब जहाजों में निकट-आक्रमण हथियार प्रणालियां (CIWS), इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम और स्टील्थ तकनीक जैसी बहुस्तरीय सुरक्षा जरूरी हो गई है. अब ध्यान लंबी दूरी की मिसाइलों और मानवरहित (Unmanned) हमला समूहों पर दिया जा रहा है. भारत जैसे देश अपने नौसैनिक बेड़े को उन्नत एंटी-शिप मिसाइलों से लैस कर रहे हैं, जिससे उन्हें क्षेत्रीय स्तर पर रणनीतिक बढ़त मिली है.

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भारत की ब्रह्मोस और भविष्य की ब्रह्मोस-II मिसाइलें एशिया में बदलते नौसैनिक संतुलन को दर्शाती हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में एंटी-शिप मिसाइलें परमाणु प्रणोदन, एआई-सहायता प्राप्त लक्ष्य प्रणाली और हाइपरसोनिक तकनीक का उपयोग करेंगी. इससे वे और अधिक घातक और प्रभावी बन जाएंगी. भविष्य का नौसैनिक युद्ध अब मिसाइल रक्षा, त्वरित प्रतिक्रिया और मानवयुक्त तथा मानवरहित प्रणालियों के एकीकृत नेटवर्क पर केंद्रित होगा जहां गति, सटीकता और तकनीकी श्रेष्ठता ही निर्णायक भूमिका निभाएंगी.

 

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