कोटा: 10 महीने से MBS अस्पताल में साइकिल स्टैंड संवेदक से नहीं की वसूली

अस्पताल प्रशासन को साइकिल स्टैंड के चलते करीब 12 लाख 50 हज़ार रुपये झटका लगा है. 10 माह बीत जाने के बाद भी न तो अस्पताल प्रशासन पूर्व संवेदक से वसूली कर पाया.

कोटा: 10 महीने से MBS अस्पताल में साइकिल स्टैंड संवेदक से नहीं की वसूली
अस्पताल प्रशासन भी पूर्व संवेदक से राशि वसूलना भूल गया.

मुकेश सोनी, कोटा: टेंडर को लेकर अक्सर सुर्खियों में रहने वाला संभाग का सबसे बड़ा एमबीएस अस्पताल एक बार फिर चर्चाओ में है. इस बार चर्चा साइकिल स्टैंड को लेकर है. 

अस्पताल प्रशासन को साइकिल स्टैंड के चलते करीब 12 लाख 50 हज़ार रुपये झटका लगा है. 10 माह बीत जाने के बाद भी न तो अस्पताल प्रशासन पूर्व संवेदक से वसूली कर पाया है, न ही पूर्व संवेदक के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवाई है. इसके चलते अस्पताल के आरएमआरएस को वित्तीय हानि हुई है. 

ये है मामला
अस्पताल प्रशासन ने साल 2017 में अस्पताल परिसर स्थित साइकिल स्टैंड का ठेका की निविदा जारी की थी. निविदा के तहत सालाना करीब 45 लाख रुपये राशि तय की थी. संवेदक ने साल भर ठेका भी चलाया लेकिन समय अवधि पूरी होने के बाद भी जब अस्पताल प्रशासन दोबारा टेंडर नही निकाल सका तो उसी संवेदक को तीन माह का अवधि विस्तार दे दिया गया. 

तीन माह तक ठेका संचालक ने साइकिल स्टैंड के पेटे लोगों से राशि वसूली लेकिन अस्पताल में जमा नही करवाई. इस बीच अस्पताल प्रशासन ने नई निविदा जारी कर दी. दूसरे संवेदक के नाम ठेका जारी हो गया. इधर, दस महीनों से अस्पताल प्रशासन पूर्व संवेदक से पैसा वसूल करना ही भूल गया, जिसके चलते आरएमआरएस को करीब 12 लाख 50 हज़ार की वित्तीय हानि हुई.

कागजों में हुआ खेल
सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, इस खेल में एक शातिर बाबू की शतरंजी चाल पूरी तरह से उल्टी पड़ गई. दरअसल ठेका अवधि खत्म होने पर इस शातिर बाबू ने संवेदक फर्म की घरोहर राशि रिलीज कर दी थी लेकिन 3 माह का अवधि विस्तार बढ़ाने के दौरान ठेका संवेदक से ना तो एडवांस चेक लिए, न ही एफडीआर जमा करवाई. जबकि नियम और शर्तों के मुताबिक संवेदक को तीन माह की राशि एडवांस जमा करवानी होती है यानी शर्त के मुताबिक तीन माह की अवधि विस्तार के पेटे पूर्व संवेदक को 12 लाख 50 हज़ार की राशि एडवांस जमा करानी थी लेकिन पूर्व संवेदक ने राशि जमा नही करवाई. 

अस्पताल प्रशासन भी पूर्व संवेदक से राशि वसूलना भूल गया. कागजों में खेल करने के चक्कर में बैक डेट में पूर्व संवेदक को नोटिस भेजता रहा. बाद भी फौरी कार्रवाई के नाम पर नयापुरा थाने में एक लिखित शिकायत भेजी गई. चार माह बीत जाने के बाद भी पूर्व संवेदक के खिलाफ पुलिस में मामला दर्ज नही हुआ. क्योकि अस्पताल प्रशासन के पास न तो पूर्व संवेदक दिया गया चेक था, न हो कोई डॉक्यूमेंट. बस यही शतरंजी चाल शातिर बाबू की गले की फांस बन गई. आरएमआरएस में 12 लाख 50 हजार की वित्तीय हानि के मामले में अस्पताल प्रबंधन भी चुप्पी साधे हुए. न निगलते बन रहा है, न ही उगलते.