अजमेर: सुप्रीम कोर्ट में केस जीतने के बाद भी 92 साल के बुजुर्ग को नहीं मिला न्याय...

सीकर रॉड जयपुर के रहने वाले भंवर लाल कुमावत अजमेर पीसांगन में स्थित अपनी 40 बीघा पुश्तैनी जमीन को लेकर दर-दर की ठोकर खा रहे हैं.

अजमेर: सुप्रीम कोर्ट में केस जीतने के बाद भी 92 साल के बुजुर्ग को नहीं मिला न्याय...
केस जीतने के बाद भी जिला प्रशासन बुजुर्ग की कोई मदद नहीं कर पा रहा.

अशोक सिंह भाटी/अजमेर: 92 साल के बुजुर्ग अपनी पुश्तैनी जमीन को हासिल करने के लिए पिछले 35 वर्षों से व्हील चेयर पर परिजनों के साथ प्रशासन के चक्कर लगा रहे हैं. लेकिन उन्हें अब तक न्याय नहीं मिला. बुजुर्ग के अनुसार वह सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) से केस जीत चुके हैं लेकिन जिला स्तर पर मिलीभगत के कारण उन्हें न्याय नहीं मिल पा रहा है.

दरअसल, सीकर रॉड जयपुर के रहने वाले भंवर लाल कुमावत अजमेर पीसांगन में स्थित अपनी 40 बीघा पुश्तैनी जमीन को लेकर दर-दर की ठोकर खा रहे हैं. पारिवारिक विवाद को लेकर भंवर लाल सुप्रीम कोर्ट से केस जीत चुके हैं. लेकिन इसके बावजूद भी जिला प्रशासन उनकी कोई मदद नहीं कर पा रहा.

मंगलवार को भंवर लाल व्हील चेयर पर अपने बेटे के साथ जिला कलेक्ट्रेट पहुंचे, जहां पर उन्होंने अपनी आपबीती कलेक्टर को सुनाना चाहिए. लेकिन उनकी इस समस्या का निदान 35 साल बाद भी नहीं हो पाया. उनका कहना है कि वह अपनी पुश्तैनी जमीन को लेकर हर दफ्तर के चक्कर लगा चुके हैं और अपनी पूरी जिंदगी न्याय की गुहार लगाने में ही बीता दी. इस दौरान उन्हें लखवा सहित विभिन्न बीमारियां भी हुई. लेकिन बिना परवाह किए वह न्याय के लिए लड़ रहे हैं.

उन्होंने कहा कि किसी ने उनकी कोई बात नहीं सुनी और ना ही जमीन वापस दिलाई, जिसके कारण अब तक लाखों रुपए इस मामले में खर्च हो गए. लेकिन जमीन नहीं मिल पाई. वहीं, भंवरलाल के 35 वर्षीय पुत्र ने बताया कि संपत्ति विवाद के सभी दस्तावेज उनके नाम पर दर्ज है लेकिन प्रशासन उनकी मदद नहीं कर रहा बनाने में साल की पिताजी भंवरलाल पिछले लंबे समय से प्रशासन के चक्कर लगा रहे हैं और हर कोर्ट में वह केस जीत चुके हैं. लेकिन रेवेन्यू बोर्ड व प्रशासन की ओर से उन्हें उनका उस दिन ही हक नहीं दिलाया जा रहा और इसमें विभिन्न समस्याएं पैदा कर दी गई.

उन्होंने कहा कि अब पूरा परिवार हिम्मत हार चुका है और उनके पास माता पिताजी के इलाज के लिए भी पैसे नहीं बचे हैं. ऐसे में अब उनके पास जिला कलेक्ट्रेट के बाहर आत्मदाह करने के सिवाय कोई चारा नहीं बचा है. इसे लेकर उन्होंने  राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री सहित तमाम अधिकारियों को पत्र लिखे हैं.

पीड़ित परिवार ने इस मामले में 1987 में एसडीओ कोर्ट में वाद दायर किया था और इसी दौरान परिवार के अन्य सदस्यों ने धारदार हथियारों से हमला भी किया गया था. इसे लेकर भी थाने में मुकदमा दर्ज कराया गया. लेकिन पुश्तैनी जमीन को लेकर कोई निर्णय नहीं हुआ, जिसके बाद उन्होंने कोर्ट में इस मामले को दायर किया तो सुप्रीम कोर्ट में 18 अगस्त 2000 को मामला में भंवरलाल के पक्ष में आया. इसके बावजूद भी वह दर-दर की ठोकर खा रहे हैं.