चूरू सीट को लेकर राजेंद्र राठौड़ और कस्वां परिवार के बीच विरोध के बाद, पिघलने लगी बर्फ

चूरू की राजनीति में राजेन्द्र राठौड़ धुरंधर माने जाते हैं. अलग-अलग दौर में राठौड़ ने अपनी प्रासंगिकता बनाए रखी है. राठौड़ के साथ ही जिले की राजनीति में कस्वां परिवार का दबदबा भी माना जाता है.

चूरू सीट को लेकर राजेंद्र राठौड़ और कस्वां परिवार के बीच विरोध के बाद, पिघलने लगी बर्फ

जयपुर: राजस्थान की बची हुई नौ सीटों पर मंथन के लिए बीजेपी नेताओं में अभी भी बैठकों के दौर जारी है. इस बीच चूरू सीट पर दो राजनीतिक परिवारों के बीच बर्फ पिघलने के आसार बनने लगे हैं. पिछले दिनों राजेन्द्र राठौड़ से कस्वां परिवार ने बातचीत की है और इस बातचीत के बाद मोदी को एक बार फिर पीएम बनाने के लिए बड़ी लड़ाई की दुहाई दी जा रही है. 

चूरू की राजनीति में राजेन्द्र राठौड़ धुरंधर माने जाते हैं. अलग-अलग दौर में राठौड़ ने अपनी प्रासंगिकता बनाए रखी है. राठौड़ के साथ ही जिले की राजनीति में कस्वां परिवार का दबदबा भी माना जाता है. खुद रामसिंह कस्वां चूरू से चार बार सांसद रहे और उनकी पत्नी कमला कस्वां भी सादुलपुर सीट से विधायक रह चुकी हैं. 

लोकसभा में अपना पहला चुनाव महज 168 वोट के अन्तर से जीतने वाले कस्वां के पुत्र राहुल कस्वां चूरू के मौजूदा सांसद हैं. राहुल कस्वां पिछली बार तो मोदी लहर मे जीत गए लेकिन इस बार फिर से कस्वां परिवार ने टिकिट पर अपना दावा जताया लेकिन बीते दिनों कोर कमेटी की बैठकों के दौरान कस्वां की जीत पर आशंका जताई गई. कोर कमेटी के सदस्यों ने यहां से दूसरे नाम पर चर्चा की बात सुझाई तो उस पर अमल भी हुआ और सतीश पूनिया के नाम के हिसाब से समीकरण खंगाले गए. 

इसके साथ ही गैर जाट चेहरों पर भी संभावनाएं तलाशी गईं. खुद बीजेपी के नेता प्रतिपक्ष राजेन्द्र राठौड़ अभी तक राहुल कस्वां को जिताऊ चेहरा नहीं मान रहे थे. उनका कहना है कि इस बार के विधानसभा चुनाव में कस्वां परिवार के मुखिया और पूर्व सांसद रामसिंह कस्वां खुद अपनी सीट नहीं बचा पाए और सादुलपुर से तीसरे स्थान पर रहें. ऐसे में अगर लोगों में कस्वां परिवार की स्वीकार्यता नहीं है तो लोकसभा में टिकट देने पर जनता उन्हें थोपा हुआ न मान लें.

हालांकि राठौड़ ने यह भी माना कि पिछले दिनों कस्वां परिवार के लोगों ने उनसे सम्पर्क किया और दोनों के बीच बातचीत भी हुई है. राठौड़ कहते हैं कि उनके मन में कस्वां परिवार के प्रति कोई गिला-शिकवा नहीं है. साथ ही उन्होंने बताया कि उनके मन में जो भी था वो पार्टी आलाकमान को बता चुके हैं. राठौड़ ने इस लड़ाई को बड़ी लड़ाई करार देते हुए कहा कि बीजेपी का लक्ष्य नरेन्द्र मोदी को एक बार फिर से प्रधानमन्त्री बनाना है और बड़े लक्ष्य के लिए छोटे-मोटे मतभेद भुलाकर सब एक हैं. 

नेताओं में वर्चस्व की आपसी लड़ाई कांग्रेस और बीजेपी में अधिकांश सीटों पर दिख रही है लेकिन दोनों ही पार्टियां केन्द्रीय नेतृत्व और बड़ी लड़ाई के नाम पर एकजुट होने की बात भी कहती हैं. अब इस एकजुटता में कितना दिखावा है और कितनी सच्चाई? इसका आंकलन तो चुनावी नतीजों से ही हो सकेगा.