बारां: आजादी के 7 दशक बाद भी गाड़िया लुहारों को नहीं मिला स्थायी आवास

गाड़िया लुहारों का कहना है कि अंता कस्बे में कई वर्षो से रह रहे है. उन्हें इधर से उधर हटा दिया जाता है.

बारां: आजादी के 7 दशक बाद भी गाड़िया लुहारों को नहीं मिला स्थायी आवास
यह लोग अनाज एवं नकदी के बदले कृषि संसाधनों की मरम्मत करके अपना जीवन यापन करते थे.

राम मेहता/बारां: राजस्थान के बारां जिले में आजादी के 72 साल बाद भी गाड़िया लुहारों को रहने के लिए अपना स्थायी आवास नसीब नहीं हो पाया है. ऐसे में गाड़िया लुहारों की चलती हुई गाड़ी ठहर जाने के कारण आज जीवन बसर करने के लिए दर-दर की ठाकरे खाने पर मजबूर होना पड़ रहा है.

महाराणा प्रताप के वंशज कहे जाने वाले गाड़िया लुहार पूर्व में अपनी बेल गाड़ियों के माध्यम से गांवो में जाकर अपना डेरा जमाते थे. जहां अनाज एवं नकदी के बदले कृषि संसाधनों की मरम्मत करके अपना जीवन यापन करते थे, परन्तु बदलते मशीनरी युग के चलते गाड़िया लुहारों का सारा धंधा चौपट हो गया है. 

वहीं, अब बैल गाड़िया, हल, तथा अन्य कृषि संसाधन नजर नहीं आते है. ऐसे में अब गाड़िया लुहार एक जगह पर ठहर गए है. साथ ही, अब पूर्व जैसे कृषि संसाधन के कार्य नहीं मिलने के कारण जीवन यापन करना भारी पड़ रहा है.

दूसरी ओर देखा जाए तो गाड़िया लुहारों में ईमानदारी कूट-कूट कर भरी हुई है. इनके पुलिस केस भी नगण्य मात्र ही है इसके बावजूद सरकार द्वारा इनकी सुध नहीं ली जा रही है.

गाड़िया लुहारों का कहना है कि अंता कस्बे में कई वर्षो से रह रहे है. उन्हें इधर से उधर हटा दिया जाता है. वहीं, काम नही मिलने के कारण बालको का भरण पोषण करना भारी पड़ रहा है. सरकार द्वारा भी कोई मदद नहीं की जा रही है. जब कि कई जगहों पर सरकार द्वारा गाड़िया लुहारों को रहने के लिए आवास दिए जा चुके हैं. वही, अंता कस्बे के गाड़िया लुहारों के साथ सौतेला व्यवहार किया जा रहा है.