Barmer News : 20 करोड़ का बीमा घोटाला, मास्टरमांइड गिरफ्तार, मामले जल्द SIT और ED की एंट्री

Barmer News : बाड़मेर में 20 करोड़ के बीमा घोटाले के मास्टरमाइंड सताराम डूडी जयपुर से गिरफ्तार कर लिया गया है. जो चोरी दिखाकर बीमा कंपनियों से ठगी करता था. अरुणाचल से गाड़ियों का फर्जी रजिस्ट्रेशन होता और तेल कंपनियों में किराए पर  गाड़ियां चलती. मामले में SIT और ED की एंट्री तय मानी जा रही ताकि इस पूरे नेक्सस का पर्दाफाश हो सके.
 

Barmer News : 20 करोड़ का बीमा घोटाला, मास्टरमांइड गिरफ्तार, मामले जल्द  SIT और ED की एंट्री
Image Credit: Barmer News

Barmer Insurance Scam : बाड़मेर पुलिस ने हाल ही में एक ऐसे घोटाले का पर्दाफाश किया है, जिसने पूरे राज्य के प्रशासनिक और कॉर्पोरेट ढांचे को हिला कर रख दिया है. मामला महज़ एक साधारण चोरी या धोखाधड़ी का नहीं बल्कि सुनियोजित, लंबे समय तक चलने वाले और कई तंत्रों की मिलीभगत से फलते-फूलते उस खेल का है, जिसने बीमा कंपनियों से लगभग 20 करोड़ रुपये का फर्जी क्लेम वसूल लिया.

मास्टरमाइंड सताराम पुत्र देरामाराम जाट को पुलिस ने जयपुर से गिरफ्तार किया. गिरफ्तारी भी तब संभव हुई जब सताराम वीज़ा बनवाने पहुंचा और विदेश भागने की तैयारी में था. जांच में सामने आया कि अलग-अलग थानों में 12 से अधिक झूठे प्रकरण दर्ज करवाए गए. चोरी बताई गई गाड़ियां कभी चोरी हुई ही नहीं, बल्कि नए नंबर लगवाकर तेल कंपनियों में किराए पर चलाई जा रही थीं. कुछ वाहन जला दिए गए और उन पर भी बीमा क्लेम ले लिया गया. सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि हाईलक्स जैसी लग्ज़री गाड़ियां तस्करों तक पहुंचा दी गईं.

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इस खुलासे ने साफ कर दिया कि यह कोई सामान्य अपराध नहीं, बल्कि एक बड़ा नेक्सस है. जिसमें अपराधी, प्रशासनिक ढांचा, पुलिस और कॉर्पोरेट कंपनियां तक किसी न किसी स्तर पर संलिप्त दिखती हैं. इस पूरे खेल को समझने के लिए आपको सताराम का काला कारोबार पहले समझना होगा.

सताराम का काला कारोबार
सताराम कोई साधारण अपराधी नहीं था. वह वर्षों से MPT (मंगला प्रोसेसिंग टर्मिनल) और RGT (रागेश्वरी गैस टर्मिनल) ऑयल फील्ड्स से जुड़ा हुआ था और उसकी गाड़ियां इन कंपनियों में किराए पर चलती थीं. यह रिश्ता डेढ़ दशक पुराना था. उसने अपराध का एक ऐसा मॉडल तैयार किया जिसमें हर कदम पर सिस्टम की खामियों का फायदा उठाया गया.

1. फर्जी चोरी की रिपोर्ट – गाड़ियां चोरी बताकर थानों में एफआईआर दर्ज करवाई जाती
2. बीमा कंपनियों पर दबाव – संगठित तरीके से क्लेम डाला जाता और उसमें ‘सिस्टम के लोग’ मदद करते
3. नया रजिस्ट्रेशन – वही गाड़ियां अरुणाचल प्रदेश में नए नंबरों से पंजीकृत करवा कर वापस ऑयल फील्ड्स में चला दी जातीं
4. सफेदपोश कारोबार – सताराम ने यह खेल इतना महीन बुना कि लंबे समय तक यह ‘कानूनी’ व्यापार जैसा लगता रहा

सताराम के प्रशासनिक अधिकारियों, पुलिसकर्मियों और स्थानीय नेताओं से गहरे रिश्ते रहे. उसके खिलाफ दर्ज मामलों में हमेशा ढील दिखी, गिरफ्तारी टलती रही और हर बार वह बच निकलता रहा. इस गिरोह का कामकाज एक छोटे से ठग की कहानी नहीं बल्कि कॉर्पोरेट-क्राइम के गठजोड़ का सबसे बड़ा नमूना है.

पुलिस की संदिग्ध भूमिका
इस पूरे मामले में पुलिस की भूमिका सबसे अधिक सवालों के घेरे में है. जिन थानों में झूठी एफआईआर दर्ज हुईं, वहां प्राथमिक जांच क्यों नहीं हुई ? चोरी बताई गई गाड़ियां जब खुलेआम तेल कंपनियों में दौड़ रही थीं, तो पुलिस ने सत्यापन क्यों नहीं किया ? सताराम के खिलाफ पुराने मामलों में गिरफ्तारी क्यों टलती रही ? क्या जिला स्तर पर कुछ पुलिस अधिकारियों की मिलीभगत इस घोटाले को संरक्षण नहीं देती रही ?

जानकार मानते हैं कि सताराम का पुलिस महकमे में गहरा नेटवर्क था. यही वजह रही कि वह लगभग 15 साल तक इस धंधे को बिना रोकटोक चलाता रहा. एसपी नरेंद्र सिंह मीना की टीम ने हालांकि इस बार निर्णायक कार्रवाई की और उसे जयपुर से गिरफ्तार किया. लेकिन यह गिरफ्तारी उन लंबे वर्षों की चुप्पी और ढिलाई पर सवाल उठाती है, जब पुलिस के पास सारे सुराग होते हुए भी सताराम आराम से घूमता रहा.

तेल कंपनियों की संदिग्ध भूमिका
इस मामले में तेल कंपनियों की भूमिका शायद सबसे चौंकाने वाली है. जिन गाड़ियों को चोरी बताया गया और जिन पर क्लेम लिया गया, वही गाड़ियां तेल कंपनियों के प्रोजेक्ट्स में किराए पर चलती रहीं. क्या कंपनियों ने कभी गाड़ियों के कागजात और बीमा स्थिति की जांच नहीं की ? सताराम की कंपनियों के साथ डेढ़ दशक पुराना अनुबंध किस आधार पर चलता रहा, जब उसके खिलाफ गंभीर आरोप सामने आते रहे ? क्या यह संभव है कि कंपनियों के मैनेजमेंट को इस फर्जीवाड़े की भनक न लगी हो ? स्पष्ट है कि कंपनियों की ओर से जानबूझकर आंखें मूंद ली गईं। कारण चाहे ‘लागत बचाना’ हो या किसी तरह की अंदरूनी सांठगांठ, लेकिन इस खेल में उनका किरदार संदिग्ध है.

इससे यह सवाल उठता है कि जब कॉर्पोरेट सेक्टर ही ऐसे गिरोहों को पनपने देता है, तो कानून का राज किस हद तक लागू हो पाएगा ? सताराम की गिरफ्तारी से भले ही पुलिस ने बड़ी सफलता हासिल की हो, लेकिन यह सिर्फ पहला कदम है. असली लड़ाई उस नेक्सस को तोड़ने की है जिसमें अपराधी, पुलिस और कॉर्पोरेट कंपनियां एक ही धागे में बंधे नजर आते हैं.

यह केस कुछ बेहद गंभीर सवाल छोड़ता है
क्या बीमा कंपनियों के अधिकारी भी इस घोटाले में शामिल थे ? पुलिस महकमे के भीतर किसने सताराम को संरक्षण दिया ? तेल कंपनियों ने इतने साल तक सताराम की गाड़ियों को कैसे बिना सत्यापन किराए पर लिया ? और सबसे बड़ा सवाल क्या यह सिर्फ सताराम का खेल था या फिर राजनीतिक-सिस्टम का साझा कारोबार ? सताराम का काला साम्राज्य इस बात की ताज़ा मिसाल है कि जब अपराध और व्यवस्था एक साथ मिलकर खेलते हैं, तो कानून की ताकत कितनी बेबस दिखती है.


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