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Barmer News : रेगिस्तान की तपती रेत से भी ज्यादा गर्म जज़्बा इस परिवार का है, जहां बाड़मेर की मिट्टी ने दूसरी पीढ़ी का सैन्य अधिकारी देकर साबित कर दिया कि सूरमा सिर्फ सीमाओं पर नहीं, गांवों की सकरी गलियों से भी निकलते हैं.
इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए खारिया तला, बाड़मेर के 21 वर्षीय विकास चौधरी ने देहरादून स्थित भारतीय सैन्य अकादमी की पासिंग आउट परेड में लेफ्टिनेंट के रूप में शपथ लेकर रेगिस्तान की धरती का सीना चौड़ा कर दिया.
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दादा केशरा राम सियाग के पौत्र और पिछले 26 साल से सेना में सेवा दे रहे वरिष्ठ अधिकारी पिता सोना राम के बेटे विकास जब परेड ग्राउंड पर ऑफ़िसर बनकर कदमताल कर रहे थे, तब दादा-दादी और माता-पिता ने खुद उनके कंधों पर स्टार लगा कर परिवार की दूसरी पीढ़ी को वर्दी का सम्मान सौंपा.
विकास ने जेईई–आईआईटी का रास्ता छोड़कर 12वीं के बाद टेक्निकल एंट्री स्कीम से ऑल इंडिया 75वीं रैंक हासिल की, गया की ऑफिसर्स ट्रेनिंग अकादमी, फिर पुणे के कॉलेज ऑफ मिलिट्री इंजीनियरिंग और जेएनयू से बीटेक के साथ कठोर सैन्य प्रशिक्षण लेकर साबित किया कि रेगिस्तान की मिट्टी मेहनत और अनुशासन से किसी भी सपने को सींच सकती है.
प्रशिक्षण के दौरान वे प्लाटून कैडेट कैप्टन, बटालियन अंडर ऑफिसर और अकादमी अंडर ऑफिसर जैसी अहम जिम्मेदारियों तक पहुंचे, खेल और घुड़सवारी में सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी ट्रॉफी, विशेष ब्लेज़र और ओवरऑल मेरिट में सिल्वर मेडल हासिल कर थर के धोरों से निकली प्रतिभा को राष्ट्रीय मंच पर चमका चुके हैं.
भारतीय सेना की इंजीनियर कोर की प्रतिष्ठित 7 इंजीनियर्स रेजिमेंट में कमीशन पाकर विकास अब उन मोर्चों पर तैनात होंगे, जहां पुल, सड़क, बंकर और बारूदी सुरंगों के बीच उनका हर फैसला देश की सुरक्षा की नई लकीर खींचेगा.)
इस उपलब्धि पर भारतीय सेना ने विशेष समारोह में परिवार को गौरव पदक से सम्मानित किया, जिसे दादा केशरा राम, दादी टीमू देवी और माता-पिता ने गर्व से ग्रहण कर यह संदेश दिया कि रेगिस्तान की झोपड़ियों में भी राष्ट्र सेवा की परंपरा पीढ़ी दर पीढ़ी चलती है.
परिवार में पहले से ताऊ गोकलाराम भारतीय वायु सेना में, पिता सोना राम और चाचा नाथूराम भारतीय सेना में सेवा दे रहे हैं; अब चौथे सदस्य के रूप में लेफ्टिनेंट विकास चौधरी ने इस सैन्य विरासत को नई ऊंचाई दी है.)
विकास अपनी सफलता का श्रेय दादा-दादी, माता-पिता, गुरुजनों और अकादमी के प्रशिक्षकों को देते हैं और खास तौर पर मां ललिता चौधरी का जिक्र करते हैं, जिन्होंने पिता की सियाचिन जैसी दुर्गम पोस्टिंग के बावजूद पढ़ाई और संस्कारों की डोर कभी ढीली नहीं होने दी. विकास से जब पूछा गया की आज कल के युवाओं को क्या कहना चाहते हो तो उन्होने कहा की अगर आप अपने मम्मी पापा को खुश रखना चाहते हो और उनके लिये कुछ बदलना चाहते हो या फिर उनके लिए कुछ करना चाहते हो तो कभी भी हिम्मत मत हारना.
इसी रेगिस्तानी मिट्टी की प्रेरणा से अब उनका छोटा भाई भाग्य वर्धन भी सेना में अफसर बनने का सपना देख रहा है, और गांव के युवाओं के बीच विकास चौधरी का यह सफर इस बात की जीती-जागती मिसाल बन चुका है कि अगर इरादा फौलादी हो तो रेत भी सोना उगल देती है.
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