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Bharatpur News: यूआईटी से प्रमोट होकर बने भरतपुर विकास प्राधिकरण में भूखंड घोटाले का बड़ा खुलासा हुआ है. जहां आम लोग प्लॉट के लिए सालों से इंतजार कर रहे हैं, वहीं बीडीए के अफसर खुद ही ''खरीदार'' बन गए. जिन पर ईमानदारी से आवंटन की जिम्मेदारी थी, उन्हीं ने सिस्टम को ठेंगा दिखाकर करोड़ों की जमीन हथिया ली. भरतपुर के सेक्टर-13 की ये कहानी सिर्फ़ भ्रष्टाचार की नहीं, बल्कि सिस्टम की चाबी अपने हाथ में करने की साज़िश है.
भरतपुर का सेक्टर जहां पिछले 18 साल से लोग एक प्लॉट के लिए तरस रहे हैं, वहां बीडीए के अफसरों ने खुद और अपने रिश्तेदारों के नाम से बहुमूल्य भूखंड हथिया लिए. प्लॉटों की लोकेशन, बोली और रजिस्ट्री... सबकुछ अफसरों ने खुद तय किया और खुद ही खरीद लिया. ये सिर्फ नियमों का उल्लंघन नहीं, सत्ता और सिस्टम की साठगांठ का चेहरा है.
बीडीए के जिन कर्मचारियों पर पारदर्शिता की ज़िम्मेदारी थी, उन्हीं ने जनता के अधिकारों पर डाका डाला. इस कॉलोनी में जहाँ आम आदमी को एक प्लॉट तक नहीं मिला, वहीं अफसरों ने एक के बाद एक भूखंड अपने नाम और रिश्तेदारों के नाम करवा लिए.
''जहाँ हर कोने में कोई न कोई रसूख नजर आता है... और हर सड़क पर यह सवाल क्या जनता के हक का प्लॉट, अब सिर्फ कुर्सी वालों का हकदार रह गया है? यह पडताल भरतपुर विकास प्राधिकरण (BDA) के उस चेहरे को उजागर करती है जो न सिर्फ़ नियमों का मखौल उड़ाता है, बल्कि ईमानदार नागरिकों के अधिकारों पर भी डाका डालता है.
सरकारी कर्मचारी अगर खुद लाभार्थी बन जाए तो फिर आम जनता कहां जाए? जिला कलेक्टर और बीडीए चेयरमैन कमर चौधरी ने जांच के आदेश दिए हैं और कहा है कि कोई नहीं बचेगा—चाहे कार्मिक हो या दलाल. डीटीपी मुकेश जांगिड़ के मुताबिक योजना 13 का नक्शा तीन बार बदला गया. अब पुराना नक्शा तक उपलब्ध नहीं है, जो खुद में घोटाले की आशंका गहरा करता है.
केस 1
जेईएन रश्मि गुप्ता — आवंटन समिति में थीं, भूमि विभाग प्रभारी भी, और उन्हीं ने 2 प्लॉट खरीद डाले.
केस 2
उनके पति सचिन गुप्ता — बिडिंग में भाग लिया, जिसमें तीन और रिश्तेदार शामिल थे.
केस 3
जेईएन संतोष — 10 लाख 20 हजार का प्लॉट खुद 15 लाख में खरीदा, जो पहले खातेदार को दिया गया था.
केस 4
AAO सौरभ की पत्नी — दो प्लॉट खातेदार से खरीदे, वह भी उसी दिन जब पट्टा जारी हुआ.
केस 5
AEN राजुल शर्मा के भाई — खुद ही आवंटन समिति में होने के बावजूद, परिवार के नाम पर प्लॉट लिया.
भरतपुर विकास प्राधिकरण की सबसे बड़ी आवासीय योजना—सेक्टर 13—जनता के लिए विकसित होनी थी. 2005 में अधिग्रहित हुई थी 2168 बीघा जमीन, जो 8 गांवों से ली गई थी. किसानों को मुआवज़े की जगह 20 फीसदी आवासीय और 5 फीसदी व्यावसायिक ज़मीन देने का समझौता हुआ. लेकिन प्लॉट आवंटन की प्रक्रिया धीमी रही, और अफसरों ने इसी का फायदा उठाया.
प्लॉट की कीमतें 1.25 से 2 करोड़ तक की हैं, लेकिन खरीदार वही जो सिस्टम से जुड़े थे. सिविल सेवा नियम कहते हैं की कर्मचारी कार्यस्थल के दायरे में संपत्ति नहीं खरीद सकता हैं...किसी भी संपत्ति लेनदेन के लिए पूर्व सूचना/अनुमति अनिवार्य हैं....सालाना प्रॉपर्टी डिक्लेयरेशन अनिवार्य होने के साथ नियम उल्लंघन पर विभागीय जांच, निलंबन, सेवा समाप्ति तक का प्रावधान हैं....अगर स्रोत संदिग्ध हुआ, तो भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 के तहत केस बन सकता है
ये सिर्फ रीयल एस्टेट का खेल नहीं, ये बीडीए की रूल बुक को कुर्सी के नीचे दबा देने वाली कहानी है... जहाँ सब कुछ कागज़ों में पारदर्शी दिखा, लेकिन अंदर ही अंदर पूरा सिस्टम ही अपने लिए बिका. यह मामला सिर्फ़ कुछ भूखंडों का नहीं है यह भरोसे, पारदर्शिता और जवाबदेही के ताने-बाने को तोड़ने की साज़िश है. अब सवाल है क्या इन अफसरों पर होगी कार्रवाई? या फिर यह घोटाला भी बीडीए की फाइलों में दफन हो जाएगा?
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