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Krishna Charan Pahadi Bharatpur: राजस्थान के भरतपुर जिले के कामां क्षेत्र में स्थित चरण पहाड़ी आज भी भगवान श्रीकृष्ण की दिव्य लीलाओं की साक्षी बनी हुई है, जहां द्वापर युग के वे चमत्कारी चरण निशान स्पष्ट रूप से उभरे हुए हैं. यह पवित्र स्थल ब्रजभूमि का अभिन्न अंग है, जहां भगवान श्रीकृष्ण ने अपना बाल्यकाल बिताया और अपनी रासलीलाओं से प्रकृति को भी मोहित कर दिया.
लुका-छिपी खेल रहे थे कान्हा
मान्यता है कि रासलीला के दौरान जब कान्हा अपनी प्रिय गोपियों से लुका-छिपी खेल रहे थे, तो वे एकांतप्रिय होकर इस पहाड़ी पर चढ़ गए. गोपियों ने आंखें मूंद लीं, लेकिन श्रीकृष्ण ने अपनी मधुर बांसुरी बजानी शुरू कर दी. उस वंशीध्वनि की तादात्म्यता ऐसी थी कि पहाड़ी का कठोर पत्थर मोम की तरह पिघलने लगा, और ठाकुरजी के चरणों के निशान चट्टान पर अमिट रूप से अंकित हो गए.
चरण चिह्नों के दर्शन
श्रीमद्भागवत पुराण में भी वर्णन मिलता है कि अक्रूर जी और उद्धव जी ने इन्हीं चरण चिह्नों के दर्शन किए थे, जब वे ब्रज आते थे. यह घटना काम्यवन के निकट हुई, जहां श्रीकृष्ण गोचारण के समय सखाओं को छोड़कर गोपियों से मिलते थे. यह चरण पहाड़ी न केवल आस्था का केंद्र है, बल्कि ब्रज के चार धामों—गोवर्धन, वृंदावन, माधुवन और बहुलावन—की उत्पत्ति से भी जुड़ी हुई है. कथा के अनुसार, नंद बाबा और यशोदा माता को 80 वर्ष की उम्र में कान्हा के रूप में संतान सुख मिला. तीन वर्ष की आयु में उनकी लीलाएं प्रारंभ हो गईं.
चार धाम स्थापित करने की मनोकामना
गोपाष्टमी के दिन जब बालकृष्ण मिट्टी से लथपथ होकर गाय चराकर लौटे, तो उनकी मनमोहक छवि देखकर माता-पिता ने चार धाम स्थापित करने की मनोकामना की. ब्रज के 84 कोस परिक्रमा में यह स्थल प्रमुख है, जहां वाराह पुराण के अनुसार सभी तीर्थ चातुर्मास में निवास करते हैं. पंडित प्रेमी शर्मा जैसे विद्वान बताते हैं कि यहां गोपियों के चरण चिह्न, कमल के पैरों के निशान, चरवाहे लड़कों और गायों के चिह्न भी दिखाई देते हैं, जो उस युग की जीवंत स्मृति हैं.
जनमाष्टमी के अवसर पर यहां भजन-कीर्तन
आज चरण पहाड़ी पर्यटकों और भक्तों के लिए तीर्थ बन चुकी है. जनमाष्टमी के अवसर पर यहां भजन-कीर्तन और रासलीला का आयोजन होता है, जो ब्रज की सांस्कृतिक धरोहर को जीवंत करता है. स्थानीय निवासी इसे भगवान की अभिव्यक्ति मानते हैं, जहां शिव भी इन चरण पादुकाओं के दर्शन करते हैं. यह स्थान हमें याद दिलाता है कि भक्ति की धुन से पत्थर भी नृत्य करने लगते हैं. ब्रज की इन अमर कथाओं से प्रेरित होकर लाखों श्रद्धालु यहां आते हैं, और यह राजस्थान की धार्मिक विरासत का प्रतीक बनी हुई है.
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