Bharatpur Gurjar Aandolan: गुर्जर महापंचायत में सहमति बनी, लेकिन युवाओं ने असंतोष जताया. नेतृत्व पर विश्वास की कमी, संप्रेषण की विफलता ने बात को पटरी से उतार दिया.
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Rajasthan News: राजस्थान के भरतपुर जिले के पीलूपुरा (बयाना) में रविवार को आयोजित गुर्जर महापंचायत ने सरकार के साथ बातचीत और मांगों पर सहमति बनने के बाद अपना समापन किया. लेकिन महापंचायत के समाप्त होते ही माहौल अचानक बदल गया. सैकड़ों की संख्या में लोग रेलवे ट्रैक पर पहुंच गए और कोटा-मथुरा पैसेंजर ट्रेन को रोक दिया. प्रदर्शनकारियों ने ट्रेन में तोड़फोड़ की और इंजन के शीशे भी तोड़ दिए, जिससे रेलवे संचालन प्रभावित हुआ.
प्रशासन की समझाइश के बाद ट्रैक से हटे लोग
स्थिति बिगड़ने के बाद प्रशासन ने तत्काल मोर्चा संभाला और प्रदर्शन कर रहे लोगों को समझाइश देकर ट्रैक से हटाया गया. सवाई माधोपुर रेलवे स्टेशन पर रोकी गई सोगरिया ट्रेन को भी अब नई दिल्ली की ओर रवाना कर दिया गया है. ट्रेन करीब 20 मिनट तक स्टेशन पर खड़ी रही. स्थिति सामान्य होने पर रेलवे ने संचालन बहाल कर दिया, जिससे यात्रियों ने राहत की सांस ली.
महापंचायत का आदेश नहीं मानने पर उठे सवाल
गुर्जर आंदोलन के इतिहास में यह पहली बार है जब महापंचायत का निर्णय अंतिम नहीं रहा. इससे पहले गुर्जर समाज के जितने भी आंदोलन हुए, सभी में महापंचायत का निर्णय सर्वमान्य माना जाता रहा है. लेकिन इस बार युवाओं ने महापंचायत के फैसले को अनदेखा करते हुए ट्रैक पर डेरा डाल दिया. इससे यह सवाल उठने लगे हैं कि आखिर बात कहां से पटरी से उतर गई? क्यों युवाओं ने नेतृत्व से असहमति जताई?
गुर्जर आरक्षण आंदोलन का इतिहास और कानूनी अड़चनें
राजस्थान में गुर्जर आरक्षण की मांग कोई नई नहीं है. वर्ष 2006 से यह आंदोलन लगातार अलग-अलग स्वरूप में सामने आता रहा है. पहली बार राज्य सरकार ने 2008 में गुर्जरों के लिए आरक्षण का विधेयक लाया, जिससे कुल आरक्षण का प्रतिशत 68 हो गया. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 50% की सीमा का हवाला देते हुए इसे खारिज कर दिया. इसके बाद 2012, 2015 और 2018 में सरकार ने अलग-अलग प्रयास किए. ओबीसी आयोग की रिपोर्ट को कोर्ट ने सही नहीं माना. इसके बाद सरकार ने मोर बैकवर्ड क्लास (MBC) बनाकर 1% आरक्षण देने की पेशकश की, जिसे गुर्जर समाज ने ठुकरा दिया. अंततः 2019 में सरकार ने ओबीसी के तहत 5% MBC आरक्षण देने का रास्ता अपनाया, जिससे कुछ हद तक राहत मिली.
गुर्जर आंदोलन के मुख्य पड़ाव और बलिदान
गुर्जर आंदोलन का इतिहास रक्तरंजित भी रहा है. 2007 के आंदोलन में 28 लोगों की जान गई, जबकि 2008 में पीलूपुरा ट्रैक पर प्रदर्शन के दौरान सात लोगों की पुलिस फायरिंग में मौत हो गई. इसके बाद सिकंदरा चौराहे पर 23 लोगों की जान गई. दिसंबर 2010, मई 2015 और 2019 के मलारना डूंगर आंदोलन में भी गुर्जर समाज सड़कों पर उतरा.
सरकार की चुनौतियां और संवाद की कोशिश
हालिया घटनाओं से सरकार के सामने दोहरी चुनौती खड़ी हो गई है- एक तरफ युवाओं की नाराजगी को संभालना और दूसरी तरफ निवेश और विकास के माहौल को सुरक्षित रखना. सरकार का रुख फिलहाल सकारात्मक है और वार्ता के जरिए समाधान की कोशिशें की जा रही हैं. गुर्जर समाज के साथ संवाद के लिए एक स्थायी समिति बनाने और तीन महीने में समीक्षा बैठक करने की योजना है.
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