राजस्थान के रवींद्र कौशिक ने पाकिस्तान से की LLB, अमानत से निकाह कर पाक सेना में हुआ शामिल, RAW एजेंट Black Tight ने खोखला कर दिया था आतंकी देश

Ravindra Kaushik: राजस्थान के श्रीगंगानगर में जन्मे रवींद्र कौशिक, जिन्हें ‘ब्लैक टाइगर’ के नाम से जाना जाता है, भारत की रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रॉ) के सबसे निपुण जासूसों में से एक थे. 

राजस्थान के रवींद्र कौशिक ने पाकिस्तान से की LLB, अमानत से निकाह कर पाक सेना में हुआ शामिल, RAW एजेंट Black Tight ने खोखला कर दिया था आतंकी देश
Image Credit: Raw Agent Ravindra Kaushik

Raw Agent Ravindra Kaushik: भारत के सबसे जाबांज जासूसों में शुमार रवींद्र कौशिक, जिन्हें ‘ब्लैक टाइगर’ के नाम से जाना जाता है, ने अपनी पहचान को छिपाकर पाकिस्तान में भारत के लिए महत्वपूर्ण खुफिया जानकारी जुटाई. 11 अप्रैल 1952 को राजस्थान के श्रीगंगानगर में जन्मे रवींद्र बचपन से ही अभिनय के शौकीन थे.

1972 में लखनऊ के एक यूथ फेस्टिवल में उनके भारतीय जासूस की भूमिका निभाने वाले नाटक ने सेना के अधिकारियों का ध्यान खींचा, जिसके बाद उन्हें भारत की रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (RAW) में शामिल होने का मौका मिला. रॉ ने उन्हें पाकिस्तान में एक गुप्त मिशन सौंपा, जहां वे नबी अहमद शाकिर के रूप में कराची पहुंचे.

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उनकी पुरानी पहचान को पूरी तरह मिटा दिया गया. कराची में रहकर रवींद्र ने एलएलबी की पढ़ाई पूरी की और पाकिस्तानी सेना में भर्ती होकर मेजर के पद तक पहुंचे. अपनी पहचान को और पुख्ता करने के लिए उन्होंने एक पाकिस्तानी लड़की अमानत से शादी की और पिता भी बने.


1979 से 1983 तक रवींद्र ने पाकिस्तान से कई महत्वपूर्ण खुफिया जानकारियां भारत भेजीं, जिनसे सीमा पर आतंकी घटनाओं को रोकने और करीब 20,000 भारतीयों की जान बचाने में मदद मिली. उनकी इस असाधारण सेवा के लिए तत्कालीन गृह मंत्री एस.बी. चव्हाण ने उन्हें ‘ब्लैक टाइगर’ का कोड नेम दिया, हालांकि कुछ स्रोत इसका श्रेय पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को देते हैं.

इसकी चर्चा द ब्लैक टाइगर: स्टोरी ऑफ सुपर स्पाई रवींद्र कौशिक नामक पुस्तक में भी है. दुर्भाग्यवश, 1983 में रॉ द्वारा भेजे गए एक अन्य एजेंट इनायत मसीह की गलती के कारण उनकी पहचान उजागर हो गई. इनायत के पकड़े जाने के बाद पाकिस्तानी एजेंसियों ने रवींद्र को गिरफ्तार कर लिया और सियालकोट व मियांवाली जेलों में उन्हें यातनाएं दी गईं.

लंबे समय तक यातनाएं सहने के बाद 2001 में उनका निधन हो गया. रवींद्र कौशिक की यह कहानी साहस, बलिदान और देशभक्ति का प्रतीक है, जो भारत के गुप्त नायकों की गौरव गाथा को अमर बनाती है.

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