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Bundi News: बूंदी के दिवंगत संत बजरंगदास लाल लंगोट वाले बाबा का नाम साहस और सहानुभूति के प्रतीक के रूप में जाना जाता है. मांडपुर पहाड़ को चीरकर मार्ग का निर्माण करना, उनकी दृढ़ता और समाज के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है. जब एक घुड़सवार की घोड़ी पहाड़ी से गिर गई, तब उनके मन में उस दर्दनाक दृश्य ने परिवर्तन की आवश्यकता को जन्म दिया. जिसके चलते राजस्थान के दशरथ मांझी कहे जाने वाले बाबा ने हैसियत और साधन से परे जाकर समाज के कल्याण के लिए एक मार्ग बनाने का संकल्प लिया.
ग्रामीणों के साथ मिलकर काम किया
बाबा ने अपने भक्तों को ग्रामीणों के साथ मिलकर काम करना शुरू किया, जिसके चलते पहाडी का सीना चीरने के लिए सामूहिक रुप से श्रमदान करने उमडने वाले क्षेत्र की महिला पुरुष भक्तो की दिनचर्या प्रमुख थी. घाटी में आग लगाना और चट्टानों को फोड़ना एक अद्वितीय प्रयास था. जब आग के गर्मी ने चट्टानों को कमजोर किया, तो रास्ता बनाने का काम शुरू हुआ. मंदिर में चढ़ावे का अंश भी इस कार्य में जोड़ दिया गया, जिससे अनेक लोग इस महाकाय परियोजना में जुट गए.
20 सालों की मेहनत के बाद सपना हुआ साकार
लगभग 20 वर्षों की मेहनत के बाद, उनका सपना साकार हुआ। नया रास्ता बन जाने से न केवल भौगोलिक दूरी कम हुई, बल्कि यह समाज को एक नई राह देने में मददगार साबित हुआ. जिन चोपहिया और दोपहिया वाहनों को अब सुगमता से यात्रा करने का मौका मिला, वे दिवंगत महंत बजरंग दास लाल लंगोट वाले बाबा यानी राजस्थान के दशरथ मांझी की साहसिकता की कहानियों को याद करते हैं. उनकी प्रेरणादायक कहानी हमें सिखाती है कि कैसे एक संकल्प से समाज में बदलाव लाया जा सकता है.
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