Chittorgarh Samachar: जर्जर हुए प्राचीन कुंड-बावड़ियां, प्रशासन नहीं ले रहा सुध

पेयजल संकट के दौरान ऐतिहासिक काल से दुर्ग के यह प्राचीन कुंड जलापूर्ति के स्त्रोत माने जाते थे, जिनकी ओर यदि प्रशासन ध्यान दे तो शहर वासियों को पेयजल की कभी कमी नहीं रहेगी.

Chittorgarh Samachar: जर्जर हुए प्राचीन कुंड-बावड़ियां, प्रशासन नहीं ले रहा सुध
अब दुर्ग और शहरवासियों के लिए पेयजल संकट सामने दिखाई दे रहा है.

Chittorgarh: पूरे विश्व में मेवाड़ की शान चित्तौड़गढ़ (Chittorgarh) का नाम बहुत ही सम्मान के साथ लिया जाता है. राजा-महाराजाओं ने किसी ऐतिहासिक दुर्ग पर कई प्राचीन कुंड और बावड़ियों का निर्माण करवाया था, जो कि आज तक दुर्ग वासियों और चित्तौड़गढ़ शहर वासियों के लिए पेयजल के प्रमुख स्रोत माने जाते हैं. 

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विगत कुछ वर्षों से पुरातत्व विभाग और जिला प्रशासन की अनदेखी के चलते दुर्ग पर स्थित करीब 84 कुंड और बावड़िया जर्जर हालत में पहुंच गई हैं और गत वर्ष मानसून की बेरुखी के चलते अब दुर्ग और शहरवासियों के लिए पेयजल संकट सामने दिखाई दे रहा है.

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पूरे विश्व में मेवाड़ की शान चित्तौड़गढ़ का नाम बहुत ही सम्मान के साथ लिया जाता है, जिसका प्रमुख कारण चित्तौड़ का विश्व प्रसिद्ध दुर्ग है, जहां पर कई शूरवीर योद्धाओं का नाम इतिहास में अमर है. वहीं, राजा महाराजाओं ने किसी ऐतिहासिक दुर्ग पर कई प्राचीन कुंड और बावड़ियों का निर्माण करवाया था, जो कि आज तक दुर्ग वासियों और चित्तौड़गढ़ शहर वासियों के लिए पेयजल के प्रमुख स्रोत माने जाते हैं.

दुर्ग पर प्राचीन काल मे राजा महाराजाओं ने करीब 84 कुंड और बावड़ियों का निर्माण करवाया था, जिनमें प्रमुख रूप से चतरंग मोरी, सूर्य कुंड, रतन बावड़ी, गौमुख कुंड, खातन बावड़ी, भीम कोड़ी कुंड, रत्नेश्वर तालाब, कुकड़ेश्वर कुंड रतन सिंह तालाब, नील भाव, पद्मिनी का तालाब प्रमुख हैं, जिनका आपस में ड्रेनेज सिस्टम बहुत ही अच्छा हुआ करता था, जिससे कि आपस में यह सभी एक दूसरे से जुड़ी हुई है जिसके चलते सभी कुंड और बावड़ियों में पानी की उपलब्धता हर समय बनी रहती थी.

विगत कुछ वर्षों से पुरातत्व विभाग और जिला प्रशासन की अनदेखी के चलते सभी कुंड बावड़िया अब जर्जर हालत में दिखाई दे रही हैं और उनका ड्रेनेज़ सिस्टम भी सफाई व्यवस्था सुचारू नहीं होने से बंद हो गए हैं और इसी कारण विगत कुछ वर्षों से सुखी और कचरा पात्र बन कर रह गई है. वहीं, गत वर्ष मानसून की बरसात के कम होने से अब चित्तौड़गढ़ में पेयजल का संकट भी गहराने लगा है और ऐसे में जब दुर्ग और शहरी क्षेत्र की कुंड और बावड़िया भी रीते हालत में है तो ऐसे में प्रशासन को अब जिले के बाहरी जल स्रोतों से पेयजल की उपलब्धता सुनिश्चित कराने पर मजबूर होना पड़ रहा है. वहीं अगर प्रशासन इन सभी प्राचीन जल स्रोतों के ऊपर ध्यान देता तो शायद इस तरह की स्थितियां पैदा नहीं होती.

बहरहाल, पेयजल संकट के दौरान ऐतिहासिक काल से दुर्ग के यह प्राचीन कुंड जलापूर्ति के स्त्रोत माने जाते थे, जिनकी ओर यदि प्रशासन ध्यान दे तो शहर वासियों को पेयजल की कभी कमी नहीं रहेगी.

Reporter- DEEPAK VYAS