विश्व विकलांगता दिवस: कॉकलियर इम्प्लांट ने बदली कई लोगों की जिंदगी, दिया सहारा

कॉकलियर इम्प्लांट ऐसा इलेक्ट्रॉनिक उपकरण है, जिसे सर्जरी के द्वारा कान के अंदरूनी हिस्से में लगाया जाता है और जो कान के बाहर लगे उपकरण से चालित होता है. 

विश्व विकलांगता दिवस: कॉकलियर इम्प्लांट ने बदली कई लोगों की जिंदगी, दिया सहारा
प्रतीकात्मक तस्वीर.

जयपुर: आज विश्व विकलांगता दिवस (World disability day) है. इस दिवस को मनाने की पीछे की असली वजह विकलांग मानसिकता वाली सोच को खत्म करना है क्योंकि जो दिव्यांग है, उसके लिए कुछ भी असंभव नहीं है. 

इस खबर में आज हम आपको आपके बच्चों से जुड़ी कुछ अहम जानकारी देंगे, जिसके बाद उनकी जिंदगी उन आम बच्चों की तरह हो सकती है, जो शारीरिक तौर पर पूरी तरह स्वस्थ होते हैं. सुनाई कम देने की दिक्कत जो कुछ बच्चों में जन्मजात होती है, जिसके चलते वो बोल भी नहीं पाते. उन सभी बच्चों और उनके परिवारों के लिए वर्ल्ड डिसेबिलिटी डे (World disability day) एक सेलीब्रेशन है, जो बताता है कि सबकुछ संभव है.

जब किसी घर में नन्हे की किलकारी गूंजती है तो सबसे ज्यादा खुशी मां-पिता को ही होती है. बच्चा बोलना और आवाज पर प्रतिक्रिया देना धीरे-धीरे सीखता है, लेकिन अगर वह लंबे समय पर ऐसा न करे तो यह बात चिंताजनक है. कम लोगों को पता होगा कि कॉकलियर उस मरीज के किए जाता है, जिनके बहरेपन की दिक्कत होती है, जिसके चलते मरीज को बोलने में भी दिक्कत होती है. 2011 में सीएम अशोक गहलोत ने कॉकलियर इम्प्लांट के लिए मुख्यमंत्री सहायता कोष से आर्थिक सहायता देने की सकारात्मक शुरुआत की थी. 

देश में 6.3 फीसदी लोग बहरेपन का शिकार 
बहरापन अपने आप में एक बड़ी समस्या है. जन्मजात या उसके बाद होने वाली इस दिक्कत के बारे में समय रहते अगर इलाज लिया जाए तो आम जिंदगी संभव है. देश में 6.3 फीसदी लोग बहरेपन का शिकार है. जन्म लेने वाले 1000 में से 4 बच्चे ऐसे होते हैं, जिन्हें सुनने की दिक्कत होने से कॉकलियर इम्प्लांट करवाना पड़ता है.  

ज़ी राजस्थान न्यूज पर अक्षिता और ताशु से मिलिए, जो सुन और बोल नहीं पाते थे लेकिन आज सभी आम बच्चों की तरह वो अपने बेहतर करियर के लिए सपने बन रहे हैं. ये बच्चे जो कभी बोल सुन नहीं पाते थे लेकिन आज सबकुछ संभव है. राजस्थान सरकार के SMS हॉस्पिटल में अपनी टीम के साथ कॉकलियर इम्प्लांट करने वाले ईएनटी डॉक्टर मोहनीश ग्रोवर इन बच्चों और उनके परिजनों की जिदंगी में नई रोशनी लेकर आए हैं. 

- कॉकलियर इम्प्लांट के रखरखाव में पैसा काफी खर्च होता है और आर्थिक तौर पर कमजोर परिवार इसको वहन नहीं कर पाते. इसके लिए राज्य सरकार से वो गुहार भी करते है ताकि जल्द इस संबंध में पॉलिसी बने.

- SMS मेडिकल कॉलेज में कॉकलियर इम्प्लांट 2010 से शुरू हुआ.
- साल 2011 से CM रिलीफ फंड से फंडिंग शुरू हुई.
- अब तक SMS हॉस्पिटल में करीब 600  कॉकलियर इम्प्लांट हुए.
- कॉकलियर इम्प्लांट SMS हॉस्पिटल जयपुर के अलावा जयपुरिया हॉस्पिटल, एसपी मेडिकल कॉलेज बीकानेर, एसएन मेडिकल कॉलेज जोधपुर, ईएनटी मेडिकल कॉलेज उदयपुर, गवर्मेंट कॉलेज कोटा, जेएलएन मेडिकल कॉलेज अजमेर में भी शुरू हो चुके हैं .
- ऑपरेशन के बाद 2:00 से 4 साल की स्पीच थेरेपी जरूरी.
- भारत में करीब 6.3 प्रतिशत लोग बहरेपन के शिकार.
- हर हजार बच्चों में से 4 के लिए कॉकलियर इम्प्लांट इंप्लांट्स की आवश्यकता
- राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने भी इस साल के बजट में जन्म के साथ ही हर बच्चे की सुनने की जांच अनिवार्य करने के लिए पॉलिसी बनाने का ऐलान किया है.
- ऐसा करने वाला राजस्थान देश का दूसरा राज्य है.

राजस्थान सरकार कॉकलियर इम्प्लांट इंप्लांट्स वाले बच्चों को उपकरण देने के लिए भी पॉलिसी बना रही है. अभी इस योजना का खाका तैयार किया जा रहा है. इससे बच्चों को बहुत सुविधाएं मिलेंगी क्योंकि बड़ी संख्या में ऐसे बच्चे और उनके परिवार हैं, जिनके पास महंगी एसेसरीज खरीदने के लिए पैसे नहीं है.

क्या होता है कॉकलियर इम्प्लांट 
कॉकलियर इम्प्लांट ऐसा इलेक्ट्रॉनिक उपकरण है, जिसे सर्जरी के द्वारा कान के अंदरूनी हिस्से में लगाया जाता है और जो कान के बाहर लगे उपकरण से चालित होता है. इसका उपयोग आवाज़ को सुनने की असमर्थता को ठीक करने के लिए किया जाता है. इस प्रक्रिया को कॉक्लियर इम्प्लांट सर्जरी कहा जाता है. इसके साथ में इसका उपयोग उस स्थिति में किया जाता है, जब आवाज को बेहतर तरीके से सुनने वाले सारे इलाज असफल साबित हो जाते हैं. 

कॉकलियर इंप्लाट कोई सुनने की मशीन नहीं है, जो आवाज़ को तेज सुनने में सहायता करे, बल्कि यह सीधे तौर पर व्यक्ति के शरीर में मौजूद सुनने वाली तंत्रिकाओं पर प्रभाव डालता है, जिससे सुनने की परेशानी का हल हो सके. कॉकलियर इम्प्लांट का उपयोग कॉक्लिया के खराब होने के कारण बहरेपन का इलाज करने के लिए किया जाता है.