सीकर: खरादी समाज के सामने रोजगार का संकट, चकला-बेलन बनाकर कमा रहे रोजी-रोटी

अब प्‍लास्टिक आइटम से बने वाकर का प्रचलन बढ़ गया है तो प्‍लास्टिक मेड खिलौनों ने खरादियों को बेरोजगारी के राहों पर लाकर खड़ा कर दिया है. 

सीकर: खरादी समाज के सामने रोजगार का संकट, चकला-बेलन बनाकर कमा रहे रोजी-रोटी
खरादी का कार्य करने वाले लोगों का कहना है कि अब लोगों ने लकड़ी के खिलौने लेना बंद ही कर दिया है.

अशोक शेखावत, सीकर: लकड़ी के खिलौने बनाकर बेचने वाले सीकर के खंडेला के खरादी समाज के लोगों के सामने रोजगार का संकट पैदा हो गया है. आधुनिकता के दौर में चाइ‍नीज और प्‍लास्टिक के खिलौनों के बढ़ते प्रचलन के चलते अब लोग लकड़ी के खिलौनों से विमुख हो चले हैं. रही सही कसर बिजली की बढ़ी हुई दरों ने पूरी कर दी आलम यह हो गया है कि खरादी समाज अब चकले बेलन बनाकर ही रोजी रोटी का जुगाड़ कर रहे हैं.

पहले जब बच्‍चा पहली बार चलने की कोशिश करता था, तब गांव ढाणियों अलबत्‍ता शहरों तक में खरादियों की ओर से बनाई जाने वाली लकड़ी की गाड़ी पकड़ाकर बच्‍चों को चलना सिखाया जाता था, जब बच्‍चा थोडा बड़ा हो जाता था, तब उसे खदियों की ओर से बनाए ट्रैक्‍टर और गाड़ियां और अन्‍य हल्‍की लकड़ी के बनाए खिलौने फिरकी गाड़ियां, झुनझुने, डमरू छोटे अन्‍य प्रकार के खिलौने गाड़ियां ट्रैक्‍टर से बहलाया जाता था. 

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बच्‍चे उन लकड़ी के खिलौने से खेला करते थे तो ऊखल-मूसल और श्रृंगारदानी सहित अनेक प्रकार के अब खरादियों के बनाए लकड़ी के खिलौने और सामान बीते जमाने की बात हो चली है. अब प्‍लास्टिक आइटम से बने वाकर का प्रचलन बढ़ गया है तो प्‍लास्टिक मेड खिलौनों ने खरादियों को बेरोजगारी के राहों पर लाकर खड़ा कर दिया है. 

बिजली की बढ़ी हुई दरों ने उनकी कमाई चौपट कर दी
खरादी का कार्य करने वाले लोगों का कहना है कि अब लोगों ने लकड़ी के खिलौने लेना बंद ही कर दिया है इसलिए उन्‍होने खिलौने बनाना बंद कर दिया है. केवल अब उनकी रोजी रोटी चकले बेलन और ब्रुश के डंडों पर आ टिकी है. केवल यही चीजे बिकती है. खरादी बिरादरी के कारीगरों का कहना है कि पहले लकड़ी भी सस्‍ती मिल जाती थी. अरडू की लकड़ी हल्‍की होने के कारण वे आसानी से जंगलों से लाकर सामान बनाकर बेच देते थे. अब पाबंदियां है. साथ ही बिजली की बढ़ी हुई दरों ने उनकी कमाई चौपट कर दी है. इनका कहना है कि सरकार की ओर से इन कुटीर उद्योगों के संरक्षण के लिए किसी तरह की सब्सिडी नहीं दी. न ही कोई अन्‍य सहयोग, जिसके चलते अब उनके सामने घर चलाना भी मुश्किल हो गया है.

वहीं, खंडेला के जनप्रतिनिधियों ने खरादियों के लिए प्रयास जरूर किए हैं. तत्‍कालीन मत्री स्‍वर्गीय गोपाल सिंह खंडेला ने अरडू की लकड़ी इन खरादियों के लिए आसानी से मुहैया हो सके, इसके लिए इस पर पाबंदी हटाई थी. पूर्व मंत्री बंशीधर बाजिया का कहना है कि सरकार को चाहिए कि खरादियों को बिजली की दरों में सबसीडी दी जाए और कुटीर उद्योगों को बढ़ावा और संरक्षण के लिए खरादियों के उत्‍थान के लिए प्रयास करने चाहिए.

खंडेला में कई सालों से चले आ रहे खरादियों के लकड़ी के बनाए सामान के व्‍यापार को प्‍लास्टिक आइटम और चाइनीज आइटम ने चौपट कर दिया. अब खरादियो को सरकार से बिजली की दरों में सब्‍सिडी और अन्‍य सरकारी सहायता की उम्‍मीद है ताकि इस पुराने कुटीर उद्योग को संरक्षण मिल सके.