6000 किलोमीटर दूर से उड़कर भारत पहुंचे ये विदेशी पक्षी, यहां हैं कुछ खास तालाब

साइबेरिया से लेकर मारवाड़ तक का करीब छः हजार किलोमीटर लम्बा सफर तय करने वाले ये पक्षी न तो अपनी राह भटकते है और न ही इनके यहां पहुंचने का समय गड़बड़ाता है. 

6000 किलोमीटर दूर से उड़कर भारत पहुंचे ये विदेशी पक्षी, यहां हैं कुछ खास तालाब
अपने लंबे सफर के दौरान यह पांच से आठ किलोमीटर की ऊंचाई पर उड़ता है. (फाइल फोटो)

मनीष रामदेव/जैसलमेर: पक्षियों के लिए इंसानों द्वारा बनाई गई सरहद मायने नहीं रखती. वो जब उड़ान भरते है तो अपनी मर्जी के मालिक होते हैं. दुनिया में जहां दिल करता है वहां उड़ते फिरते हैं और शांति का संदेश फैलाते हैं. ऐसे ही हजारों मील का सफर तय कर 'डेमोइसेल क्रेन' (कुरजां)  मारवाड़ में इस वर्ष भी पहुंच चुके हैं.

इन दिनों यह अपनी गूंज से लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर रही हैं तो वहीं, सीमा के उस पार भी अपने आने का संदेश दे रहे हैं. इस पक्षी को स्थानीय भाषा में कुरजां कहते हैं. सैंकड़ों की संख्या में इन दिनों कस्बे सहित आसपास के जलाशयों खेतों में कुरजां के झुंड दिखाई दे रहे है. खास बात यह है कि साइबेरिया से लेकर मारवाड़ तक का करीब छः हजार किलोमीटर लम्बा सफर तय करने वाले ये पक्षी न तो अपनी राह भटकते है और न ही इनके यहां पहुंचने का समय गड़बड़ाता है. पक्षी विशेषज्ञ भी इनकी गजब की टाइमिंग के कायल हैं.

दरअसल, कुदरत ने पक्षियों को कुछ विशेष क्षमता प्रदान की है. इस क्षमता के बल पर कुरजां साइबेरिया के मौसम में शुरू होने वाले बदलाव को पहले से जान लेती है कि अब मौसम बदलने वाला है. मौसम में बदलाव शुरू होते ही हजारों की तादाद में कुरजां भारतीय मैदानों की तरफ उड़ान भरना शुरू कर देती है. बगैर किसी जीपीएस की मदद के ये पक्षी करीब छह हजार किलोमीटर का सफर तय कर मारवाड़ पहुंच जाती है. सर्दी के आगमन के साथ ही कुरजां के समूह वहां से उड़ान भरना शुरू कर देते है और मारवाड़ में रातों के ठंडा होना शुरू होने के साथ यहां पहुंच जाती है.

ऐसे आती है कुरजां
कुरजां एक खूबसूरत पक्षी है जो सर्दियों में साइबेरिया से ब्लैक समुद्र से लेकर मंगोलिया तक फैले प्रदेश से हिमालय की ऊँचाइयों को पार करता हुआ हमारे देश में आता है. सर्दियां हमारे मैदानों और तालाबों के करीब गुजारने के बाद वापस अपने मूल वतन में लौट जाता है. अपने लंबे सफर के दौरान यह पांच से आठ किलोमीटर की ऊंचाई पर उड़ता है.

रामदेवरा के तालाब व मैदानी भाग बने प्रवास स्थल
ये पक्षी रामदेवरा व आसपास क्षेत्र के गांवों में स्थित तालाबों पर सर्दी के मौसम में आते ही आ जाते है. इस वर्ष गत एक महीने से इस विदेशी पक्षी के झुंड मावा, छायण गांव के मुख्य तालाब रामदेवरा-सिहड़ा मार्ग पर स्थित तालाबों जैन मन्दिर के सामने व कई खड़ीनों में देखे जा सकते हैं. कुरजां का प्रिय भोजन खेतों में होने वाला मतीरा और धान के दाने होते है.  इसके साथ ही ये जलाशयों के किनारे कीट पतंगों को भी खाते है. इस बार इस इलाके में हुई अच्छी बारिश से कुरजां को खेतों में अच्छा भोजन मिल रहा है.

कुरजां लोक गीत की पृष्ठभूमि
कुरजां यहां के परिवेश में इतना घुलमिल गया है कि इस पर कई लोक गीत बन चुके है. राजस्थानी विरह गीत कुरजां में कुरजां के माध्यम से सात समंदर पार पत्नी द्वारा अपने पति को संदेश पहुंचाने का शानदार चित्रण है. नारी की तो अन्तरात्मा की आवाज ही ये लोक गीत हैं. अपने राग विराग, घृणा, प्रेम, दुःख की जिन भावनाओं को नारी स्पष्ट नहीं कह पाती उन्हें उसने लोक गीतों के द्वारा गा गाकर सुना दिया है. लोक गीतों में अपने अपनी विरह वेदना को कुरुजां पक्षी से प्रियतम को संदेश भिजवाना चाहा जिसमें असीम करुणा और मिलन की ललक व्यक्त है.