जयपुर: 24 घंटे में सप्लाई होने वाला सिलेंडर उपभोक्ताओं के पास दो से तीन दिन में पहुंच रहा

राजधानी जयपुर में आईओसीएल के करीब साढे चार लाख एलपीजी उपभोक्ताओं को बुकिंग के बाद गैस सिलेंडर लेने के लिए दो से तीन दिन का इंतजार करना पड़ रहा है. 

जयपुर: 24 घंटे में सप्लाई होने वाला सिलेंडर उपभोक्ताओं के पास दो से तीन दिन में पहुंच रहा
प्रतीकात्मक तस्वीर

जयपुर: राजधानी जयपुर में आईओसीएल के करीब साढे चार लाख एलपीजी उपभोक्ताओं को बुकिंग के बाद गैस सिलेंडर लेने के लिए दो से तीन दिन का इंतजार करना पड़ रहा है. आईओसीएल ने सिलेंडर लेने के लिए ग्राहक को DAC (डिलीवरी ओथोन्टिफिकेशन कोड) डिलेवरीमैन को देना अनिवार्य कर दिया है. उसके बाद ही सिलेंडर देने का प्रावधान किया गया है. इस सिस्टम के लागू होने से सबसे ज्यादा दिक्कतें उन उपभोक्ताओं को हो रही है. जिनके पास मोबाइल नहीं हैं या फिर वो लैडलाइन से अपने गैस सिलेंडर की बुकिंग करवाते हैं. ऐसे में इन दिनों उपभोक्ताओं और हॉकर्स के बीच झगडे की नौबत तक आ रही है.

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उपभोक्ताओं को सिलेंडर लेने के लिए  DAC (डिलीवरी ओथोन्टिफिकेशन कोड) डिलेवरीमैन को देने का सिस्टम लागू होने के बाद जयपुर शहर में IOCL की गैस एजेंसियो पर दो से तीन दिन का बैकलॉक हो गया है. भले ही तेल कंपनी की इस सिस्टम को लागू करने की मंशा गैस एजेंसी संचालकों पर शिकंजा कसना हो लेकिन उपभोक्ता के लिए ये किसी परेशानी से कम नहीं है. किसी को अर्जेंट सिलेंडर चाहिए और उसके पास DAC कोड होगा तो ही उसको सिलेंडर मिलेगा. आईओसीएल ने राजस्थान में सिर्फ जयपुर शहर में इस व्यवस्था को लागू किया हैं. जिसमें  उपभोक्ता सिलेंडर बुकिंग कराएगा उसके मोबाइल नंबर पर गैस कंपनी से DAC (डिलीवरी ओथोन्टिफिकेशन कोड) का मैसेज आएगा.

जब डिलीवरबॉय सिलेंडर देने आएगा तो उसे DAC बताना पड़ेगा. डिलीवरबॉय DAC कोड कंपनी के मोबाइल पर भेजेगा. वहां से सही जवाब आने पर ही सिलेंडर उपभोक्ता को दिया जाएगा. नहीं तो सिलेंडर नहीं मिलेगा. इस सिस्टम को लागू होने के बाद डिलीवरीमैन और ग्राहकों में झगड़े की नौबत आने लगी है. जब सिलेंडर देने के लिए हॉकर जाता हैं और उपभोक्ता से DAC (डिलीवरी ओथोन्टिफिकेशन कोड) मांगता है तो या तो उपभोक्ता को मोबाइल पर कोड मिलता नहीं है या फिर लैडलाइन नंबर से बुकिंग होने के कारण कोड पहुंचता नहीं है.

उधर कंपनी के अधिकारियों का कहना है कि शुरूआती दौर में दिक्कते आती हैं, लेकिन इससे वास्तिवक उपभोक्ता तक सिलेंडर पहुंचेगा और बीच में लीकेज की कोई गुंजाइश नहीं रहेगी. जयपुर शहर में आईओसीएल की करीब 29 गैस एजेंसियों पर घरेलू गैस के साढे चार लाख उपभोक्ता हैं. प्रतिदिन साढे 12 हजार सिलेंडर की खपत होती है.

सिस्टम लागू होने से ये आ रहीं दिक्कते
-कुछ लोगों के पास मोबाइल नहीं या फिर लैडलाइन से बुकिंग करवाते हैं,जिसके कारण  DAC कोड नहीं मिलता
-कुछ उपभोक्ताओं के पास  DAC कोड ही नहीं पहुंच रहा यदि रि-सेंड करते तो करीब 20 मिनट का समय लगता
-जब हॉकर उपभोक्ता के घर पर सिलेंडर लेकर पहुंचता तो बुकिंग करवाने वाला व्यक्ति घर पर नहीं मिलता
-जिसके कारण घर में मौजूद अन्य सदस्य  DAC कोड देने में असमर्थता जताते हैं
-एक उपभोक्ता को सिलेंडर देने में समय लग रहा जिसके कारण सप्लाई भी धीरे हो गई,बैकलॉक बढता जा रहा

तेल कंपनियों का तर्क
-इस सिस्टम के लागू होने से वास्तवित उपभोक्ता तक सिलेंडर पहुंचेगा
-डिजिटल इंडिया की मुहीम केतहत डिलीवरी कंफर्मेशन डिजिटल होगी
-ग्राहक ने जिस मोबाइल नपर रिफिल बुक किया हैं उस फोन नंबर पर  DAC प्राप्त होगा
-यदि ग्राहक लैंडलाइन या मैन्यूअली बुकिंग करवाता हैं तो उसे दूसरा नंबर रजिस्टर्ड करवाना होगा
-डिलीवरीमैन इस नए रजिस्टर्ड मोबाइल नंबर पर  DAC को रि-सैंड कर सकता हैं

उधर एलपीजी फेडरेशन आफ राजस्थान के महासचिव कार्तिकेय गौड़ ने बताया कि जयपुर शहर में DAC (डिलीवरी ओथोन्टिफिकेशन कोड) सिस्टम के लिए ना तो उपभोक्ताओं को पहले जानकारी दी गई और ना ही इसका प्रचार प्रसार किया गया है. गैस एजेंसी संचालकों को ग्राहक को समय पर सिलेंडर पहुंचाना भी बड़ी चुनौती बन गया है. जयपुर शहर में अधिकतर उपभोक्ताओं ने पुराने कनेक्शन लिए हुए हैं. जिसमें या तो लेंड लाइन नंबर लिखे गए हैं अथवा मोबाइल नंबर दर्ज करवाया गया हैं वह नंबर बंद हो गया हैं और अन्य लोगों को अलॉट हो गया है. गैस एजेंसी संचालकों का कहना हैं की जहां पहले एक गैस एजेंसी से करीब 300 से 400 गैस सिलेंडरों की सप्लाई होती थी अब वो घटकर 200 के करीब आ गई है. क्योंकी एक डिलीवरीमैन को एक घर तक सिलेंडर देने में ज्यादा समय खर्च हो रहा है.

बहरहाल,  तेल कंपनियों का तर्क ठीक हैं की इससे वास्तवित उपभोक्ताओं तक सिलेंडर पहुंचेगा और लीकेज रूकेगा, लेकिन इसे पूरी तरह से मजबूती से लागू करने लिए इस सिस्टम को अपडेट करने के साथ प्रचार-प्रसार करने की भी जरूरत है. साथ ही ऐसे उपभोक्ता जिनके पास मोबाइल नहीं हैं उनके लिए विकल्प ढूंढने होंगे.

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