महाशिवरात्रि: अनोखे हैं अचलगढ़ के भोलेनाथ, यहां भक्त करते हैं महादेव के अंगूठे की पूजा

शिव पुराण एवं स्कंद के अनुसार, स्वयं शिव काशी के बाद विविध रूपों में सिरोही जिले के माउंट आबू की अरावली पर्वत श्रृंखला में निवास करते हैं. इस लिए माउंट आबू को अर्धकाशी के नाम से भी जाना जाता है. 

महाशिवरात्रि: अनोखे हैं अचलगढ़ के भोलेनाथ, यहां भक्त करते हैं महादेव के अंगूठे की पूजा
आज इस स्थान को अचलगढ़ के रूप में जाना जाता है.

साकेत गोयल, सिरोही: देवों के देव महादेव की लीला अपरंपार है. जटाधारी शिव इस संसार की मोह माया से मुक्ति देकर अपने अपने भक्तों का बेड़ापार करते हैं. अन्य देवताओं के मुकाबले अपने भक्तों की सामान्य सी पूजा से प्रसन्न होने वाले देवाधिदेव को इसलिए महादेव भी कहा जाता है. 

अरावली पर्वत श्रृंखला में शिव के निवास का वर्णन स्वयं शिव पुराण एवं स्कंद पुराण में मिलता है. शिव पुराण एवं स्कंद के अनुसार, स्वयं शिव काशी के बाद विविध रूपों में सिरोही जिले के माउंट आबू की अरावली पर्वत श्रृंखला में निवास करते हैं. इस लिए माउंट आबू को अर्धकाशी के नाम से भी जाना जाता है. 

महाशविरात्रि के अलावा श्रावण के पूरे माह में माउंट आबू में देश के सुदूरवर्ती भागों से देवाधिदेव महादेव के दर्शन के लिए आते हैं. पुराणों में उल्लेख है कि इन पर्वत श्रृंखला में स्वयं शिव, अन्नत: रूप में विद्यमान है. यही कारण भी है कि राजस्थान के सिरोही जिले में सर्वाधिक मठ मंदिर पूरे जिलें में विभिन्न स्थानों पर बने हुए हैं.

अचल गढ़ में होती देवाधिदेव महादेव के अंगूठे की पूजा
स्कंद पुराण के अनुसार, ऋषि वशिष्ठ इन्हीं अरावली पर्वत माला में एक गुफा में तपस्या किया करते थे. उनके पास में एक गाय नंदनी थी. स्कंद पुराण में उल्लेख के अनुसार, इंद्र के बज्र के प्रहार से इस पर्वत श्रृंखला में एक ब्रह्म खाई बन गयी थी और स्वयं ऋषि वशिष्ठ भी इसी ब्रह्म खाई के पास में ही बैठकर के तपस्या करते थे. इसी स्थान पर ब्रह्म खाई होने से ऋषि वशिष्ठ की गाय नंदनी उस ब्रह्म खाई में रोजाना गिर जाती थी. 

अरावली पर्वत श्रृंखला विश्व में सर्वाधिक लंबी पर्वत श्रृंखला
रोजाना की इसी समस्या से परेशान होकर के ऋषि वशिष्ठ ने इस ब्रह्म खाई को भरने की ठानी और आग्रह पूर्वक पर्वतों के राजा हिमालय राज के पास में पहुंचे. ऋषि वशिष्ठ के इस आग्रह को हिमालय राज ने जल्द ही स्वीकार कर अपने श्रेष्ठ पुत्र अरावली को इस ब्रह्म खाई को भरने के लिए भेजा लेकिन गहरी खाई को नहीं भर पाया. फिर इसी स्थान पर पूर्ण रूप से फैल कर लेट गया. इसी कारण अरावली पर्वत श्रृंखला विश्व में सर्वाधिक लंबी पर्वत श्रृंखला मानी जाती है, जो राजस्थान के पूरे प्रदेश के अलावा पंजाब के बॉर्डर पर भी दिखाई देती है.

काशी से ही महादेव ने खाई को पाटा था
जब हिमालय राज के श्रेष्ठ पुत्र अरावली इस ब्रह्म खाई को पाट पाने में सफल नहीं हो पाएं तो पुन: ऋषि की प्रार्थना पर हिमालय राज ने एक लंगड़े पर्वत नंदीराज को एक विशाल अवरूद्ध सर्प पर सवार कर इस स्थान पर भेजा. यहां पर आने के बाद में नंदीश्वर पर्वत भी इस ब्रह्म खाई में भीतर गहराई तक समाने लगा तो चिंतित होकर ऋष्ठि वशिष्ठ ने देवाधिदेव महादेव से इस ब्रह्म खाई को भरने की प्रार्थना की. ऋषि वशिष्ठ की करूण प्रार्थना की पुकार सुन महादेव ने काशी से ही अपने दाहिने पैर को फैलाकर के अपने अंगूठे से इस नंदीश्वर पर्वत को अधर कर कर दिया और बाद में इस स्थान का नाम अचलेश्वर महादेव के नाम से विख्यात हो गया. 

पर्वत स्वयं देवाधिदेव महादेव के अंगूठे पर स्थिर 
आज इस स्थान को अचलगढ़ के रूप में जाना जाता है. शिव पुराण एवं स्कंद पुराण में यह उल्लेख है कि स्वयं शिव के साक्षात् अंगूठें के इस स्थान पर होने से ही यह पर्वत स्वयं देवाधिदेव महादेव के अंगूठे पर स्थिर है, इसलिए स्वयं एक साक्षात रूप में स्वयं शिव इस स्थान पर विराजमान हैं. वे मन से की गई प्रार्थना को जल्द पूरा कर भक्तों का कल्याण करते हैं.