हाथ-पांव से अक्षम लेकिन तैयार करते हैं ड्रेस, विदेशों में भी लोग मुरीद

गलता की पहाड़ियों के कुष्ठाश्रम में रहने वाले कुष्ठरोगी हाथ-पांव से अक्षम हैं.

हाथ-पांव से अक्षम लेकिन तैयार करते हैं ड्रेस, विदेशों में भी लोग मुरीद
अब इनके हुनर को विदेश तक पसंद किया जा रहा है.

आशीष चौहान/जयपुर: बाधाएं आती हैं आएं, घिरें प्रलय की घोर घटाएं, पावों के नीचे अंगारे, सिर पर बरसें यदि ज्वालाएं, निज हाथों में हंसते-हंसते, आग लगाकर जलना होगा, कदम मिलाकर चलना होगा. कविता की इन पंक्तियों को सच में चरितार्थ किया है जयपुर के 72 कुष्ठरोगियों की टीम ने. 

ये कहानी है गलता की पहाड़ियों के कुष्ठाश्रम में रहने वाले कुष्ठरोगियों की जो हाथ-पांव से असक्षम हैं. लेकिन इसके बाद भी कुष्ठरोगियों ने कभी हौसला नहीं खोया और अपनी कमजोरी को सबसे बडी ताकत बना ली. ये कुष्ठरोगी बिना उगंलियों के भी इंसान के पहनने वाले कपड़े को तैयार करते है. ये कपड़ा भारत मे नहीं बल्कि देश विदेश में भी बिकने लगे है. 

खबर के मुताबिक कुष्ठाश्रम में बगरू प्रिंट की चादर बनाई जाती है. यहां तक ही कपड़ा भी खुद ही तैयार किया जाता है. यहां के उपाध्यक्ष सीताराम बताते है कि 40 सालों से हम इसी कुष्ठाश्रम में रहते है और यहीं पर अपना जीवन यापन करते है. इस आश्रम में आने के बाद न केवल हम आत्मनिर्भर बने, बल्कि हमें नई जिंदगी मिली. वहीं दूसरे कारीगर गजानंद का कहना है कि हमे यहां आने पर दूसरी नई जिदंगी मिली है.

कुष्ठाश्रम के पदाधिकारी भी कुष्ठरोगी
सार्थक मानव कुष्ठाश्रम की सबसे खास ये है कि इस आश्रम को संभावने वाले पदाधिकारी खुद ही कुष्ठरोगी है. आश्रम की समिति का जिम्मा भी इन्ही के कंधों पर है. एक दूसरे की कमजोरियों को मजबूत बनाकर चलना इनकी सबसे बडी ताकत बन गई है. जहां कभी समाज भी इनके दूर भागता था, अब इनके हुनर को विदेश तक पसंद किया जा रहा है. 

कपड़ो की पूरी गांरटी 
खबर के मुताबिक कपड़ो को बनाने को काम कारीगर कुष्ठाश्रम में ही करते है. यहां तक कि ये कारीगर बनाए हुए कपड़ों की मजबूती की गांरटी भी लेते है. इनके द्वारा तैयार की गई बैडशीट पर बगरू प्रिंट काफी मजबूत होता है. इसके साथ ही ये लोग मैट, टॉवल और भी बहुत सी चीजे हाथ से तैयार करते है. जिसके कारण आज इनके काम की तारीफ न केवल हिदुस्तान में बल्कि जर्मनी और इग्लैण्ड भी हो रही है.