भरतपुर: केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान में कुत्तों का आतंक, रोजाना कर रहे सांभर-चीतलों का शिकार

घना में कुत्ते बड़ी समस्या बन गए हैं. यह रोजाना चीतल का शिकार कर रहे हैं. कुत्तों के कारण ही करीब 10 साल पहले कृष्णमृग खत्म हो गए जबकि इनकी संख्या कभी 200-250 हुआ करती थी. 

भरतपुर: केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान में कुत्तों का आतंक, रोजाना कर रहे सांभर-चीतलों का शिकार
सांभर और चीतल नाजुक वन्य जीव हैं, जिन्हें कुत्तों का समूह आसानी से शिकार बना लेते हैं.

देवेंद्र सिंह, भरतपुर: केवलादेव राष्ट्रीय पक्षी उद्यान (Keoladeo National Park) में कुत्ते बेलगाम हो गए हैं क्योंकि कुत्तों को पकड़ने के लिए लंबे समय से कोई अभियान नहीं चलाया गया है. कुत्ते खासकर चीतलों और सांभरों की जान के दुश्मन बन गए हैं.

हाल ये हैं कि शिकारी बन चुके ये कुत्ते अब घने जंगल में ही नहीं, बल्कि सड़क और पगडंडियों के सहारे भी चीतलों का शिकार कर रहे हैं. ऐसे फोटो सैलानियों ने मीडिया को मुहैया कराए हैं, जो काफी वीभत्स हैं. इस पूरे मामले में जिला कलक्टर नथमल डिडेल ने नाराजगी जताते हुए पार्क से आवारा कुत्तों को हटाने की बात करते हूए इसे बहुत ही संवेदनशील बताया है.

घना में कुत्ते बड़ी समस्या बन गए हैं. यह रोजाना चीतल का शिकार कर रहे हैं. कुत्तों के कारण ही करीब 10 साल पहले कृष्णमृग खत्म हो गए जबकि इनकी संख्या कभी 200-250 हुआ करती थी. सांभर भी कम होते जा रहे हैं. केवलादेव राष्ट्रीय पक्षी उद्यान में आधा दर्जन से अधिक कुत्तों के समूह सक्रिय हैं, जो चीतल और सांभरों का शिकार कर लेते हैं. 

कुत्तों ने सांभरों का शिकार कर लिया
कुत्तों की संख्या 30 से अधिक बताई जाती है. यह समूह नील गाय जैसे दमखम वाले वन्य जीवों का भी शिकार करने की कोशिश कर चुके हैं. यह कुत्ते आसपास के गांवों से नरेगा श्रमिकों के साथ घना में आ जाते हैं और अनेक बार यही रह जाते हैं. साथ ही पार्क में तैनात कुछ कार्मिकों ने भी कुत्ते पाल रखे हैं, जो शिकार करते हैं.

सैलानियों द्वारा सांभर कम दिखने की शिकायत की जाती रही हैं. सवाल खड़ा हो रहा है कि क्या कुत्तों ने सांभरों का शिकार कर लिया? घना के वन्य जीवन गणना के मुताबिक सांभरों की संख्या करीब 40 हैं किंतु जानकार मानते हैं कि हकीकत में इनकी 8-10 के करीब हैं. 

गौरतलब है कि सांभर और चीतल नाजुक वन्य जीव हैं, जिन्हें कुत्तों का समूह आसानी से शिकार बना लेते हैं. यही हाल अन्य वन्य जीवों का भी है. 37 साल में सारस की संख्या 258 से हटकर 83 रह गई है.

वर्ष चीतल सांभर
2017 3560 47
2018 3393 40
2019 2692 41 

जानकार कहते हैं कि यह बिलकुल सरिस्का के बाघों जैसा है क्योंकि गणना करने वाले और आंकड़ों को सार्वजनिक करने वाले भी घना के ही कर्मचारी हैं. इसलिए वन्य जीवों की गणना सिर्फ आंकड़ों का खेल है. कभी भी प्रबंधन गणना के तुरंत बाद आंकड़ों को सार्वजनिक नहीं करता. मुख्यालय से मंजूरी के नाम पर काफी समय बाद जारी किया जाता है. जैसे कि हाल ही में 24 जनवरी को हुई जलीय पक्षियों की गणना. इसके आंकड़े अभी तक सार्वजनिक नहीं किए गए हैं.