कोरोना संकट से जूझ रही दुनिया का इस महाविनाश पर नहीं गया ध्यान, तो क्या...

पृथ्वी पर भूकम्प, सुनामी, चक्रवात, अतिवृष्टि जैसी विध्वंसकारी घटनाओं में इजाफा होने लगा है.

कोरोना संकट से जूझ रही दुनिया का इस महाविनाश पर नहीं गया ध्यान, तो क्या...
प्रतीकात्मक तस्वीर.

हनुमान तंवर, नागौर: भौतिकता और विलासिता की अंधी भाग-दौड़ में मशगूल मनुष्य के कारण पृथ्वी खतरे के कगार पर है. दुनिया एक तरफ जहां कोरोना से जंग लड़ रही है, वहीं दूसरी तरफ प्रकृति के बदलते रंग और धरती का बढ़ता तापमान इशारा कर रहे हैं मानव जाति और पृथ्वी की तरफ बढ़ रहे एक बहुत बड़े खतरे की तरफ. पढ़े इस रिपोर्ट में पृथ्वी को महाविनाश की ओर धकेलते इंसान की कहानी-

इंसान पर्यावरण के उपभोग के एवज में उसके संरक्षण से दूर हो रहा है, जिससे वैश्विक ताप वृद्धि दुनिया के सामने हैं. पृथ्वी पर भूकम्प, सुनामी, चक्रवात, अतिवृष्टि जैसी विध्वंसकारी घटनाओं में इजाफा होने लगा है. एक अध्ययन में सामने आया है कि वर्ष 2010 से 2019 धरती का सबसे गर्म दशक था और साल 2016 सबसे गर्म साल जबकि 2019 दूसरा सबसे गर्म वर्ष आंका गया हालांकि इस दौरान पृथ्वी की सतह के तापमान 0.04 डिग्री सेल्सियस ही बढ़ा लेकिन वैज्ञानिकों की मानें तो यह बहुत ही खतरनाक स्तर है क्योंकि धरती का तापमान अगर 1 डिग्री बढ़ता है तो वही विनाश ला देता है. 

पृथ्वी की गर्भ में हो रही हलचल और प्लेट खिसकने के कारण वैश्विक स्तर पर भूकंप - सूनामी और ज्वालामुखी की एवं जलवायु परिवर्तन के कारण चक्रवाती तूफान, अतिवृष्टि, सूखे की परिस्थितिया और तेज गर्मी और भीषण सर्दी में भारी बर्फबारी जैसी प्राकृतिक आपदाओं से पृथ्वी के सभी महाद्वीप व महासागर प्रभावित हो रहे हैं. समुद्र के किनारे पर स्थित बसावट वाले इलाकों को भी खतरा बढ़ गया है. भूगर्भीय हलचलों के कारण लगातार बड़े विनाशकारी भूकंप आ रहे हैं.

दुनिया में इस अर्धशताब्दी में आये विनाशकारी भूकंप

तांगशान, 1976 - चीन की राजधानी बीजिंग से करीब 100 किलोमीटर दूर तांगशान में आए भूकंप ने 2,55,000 लोगों की जान ली. गैर आधिकारिक रिपोर्टों के मुताबिक मृतकों की संख्या 6 लाख से ज्यादा थी. 7.5 तीव्रता वाले उस भूकंप ने बीजिंग तक अपना असर दिखाया.

ईरान 1990 - 21 जून 1990 को ईरान के गिलान में आये तेज भूकंप ने 40 हज़ार जिंदगियां लील ली. हजारों लोग इसमें घायल हो गये. धन जन की भी अपार क्षति हुई.

हिंद महासागर, 2004 - दिसंबर 2004 को 9.1 तीव्रता वाले भूकंप ने इंडोनेशिया में खासी तबाही मचाई. भूकंप ने 23,000 परमाणु बमों के बराबर ऊर्जा निकाली. इससे उठी सुनामी लहरों ने भारत, श्रीलंका, थाइलैंड और इंडोनेशिया में जान माल को काफी नुकसान पहुंचाया. सबसे ज्यादा नुकसान इंडोनेशिया के सुमात्रा द्वीप में हुआ. कुल मिलाकर इस आपदा ने 2,27,898 लोगों की जान ली. 17 लाख लोग विस्थापित हुए.

कश्मीर, 2005 - भारत और पाकिस्तान के विवादित इलाके कश्मीर में 7.6 तीव्रता वाले भूकंप ने कम से कम 88 हजार लोगों की जान ली. सुबह सुबह आए इस भूकंप के झटके भारत, अफगानिस्तान, ताजिकिस्तान और चीन तक महसूस किए गए. पाकिस्तान में करीब 87 हजार लोगों की मौत हुई. भारत में 1,350 लोग मारे गए.

सिंचुआन, 2008 - 87,000 से ज्यादा लोगों की जान गई. करीब एक करोड़ लोग विस्थापित हुए. 7.9 तीव्रता वाले भूकंप ने 10,000 स्कूली बच्चों की भी जान ली. चीन सरकार के मुताबिक भूकंप से करीब 86 अरब डॉलर का नुकसान हुआ.

हैती, 2010 - 12 जनवरी 2010 को हैती में आया. 7.0 तीव्रता वाले भूकंप में 3,16,000 लोगों की मौत हुई थी और इस देश का इतिहास और भूगोल हमेशा के लिए बदल गया था.

जापान, 11 मार्च 2011- जापान के पूर्वोत्तर तट पर 9.0 की तीव्रता से भूकंप आने से भयानक तबाही मची. 18 हजार से अधिक लोगों की इसमें मौत हो गई.

नेपाल 2015 - नेपाल में 25 अप्रैल 2015 को 7.8 तीव्रता का भूकंप आया था. इस विनाशकारी भूकंप के कारण 9 हजार से ज्यादा लोग मारे गए थे, और 23 हजार से ज्यादा लोग घायल हुए थे.

अब तक धरती पर पांच बार महाविनाश हुआ है, जिसे वैज्ञानिक मास एक्सटिंक्शन का नाम देते हैं. ऑर्डोवियन, डेवोनियन, पर्मियन, ट्राइसिक जिसे जुरासिक एक्सटिंक्शन भी कहते हैं और क्रीटेशस-तृतीयक (या के-टी) मास एक्सटिंक्शन यह सभी इतने बड़े महाविनाश थे, जिनमें पृथ्वी पर मौजूद 70 से 90 फिसद्दी वनस्पति और जीव नष्ट हो गए थे. यह सभी महाविनाश प्राकृतिक थे. लेकिन वैज्ञानिकों के अनुसार अब पृथ्वी छठे महाविनाश की तरफ बढ़ रही है लेकिन यह महाविनाश प्राकृतिक नहीं होगा बल्कि इंसान पृथ्वी को इस महाविनाश की तरफ धकेल रहा है और यह मानवजनित महाविनाश होगा!

प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन हो रहा 
तकरीबन 500 सालों में इंसान ने जो प्रगति की, जिसे इंडस्ट्रियल रिवोल्यूशन यानी औद्योगिक क्रांति का नाम दिया गया है लेकिन इन 500 वर्षों में बेतहासा कार्बन उत्सर्जन करके हमने इस 415 पीपीएम तक पहुंचा दिया है जो बहुत ही खतरनाक स्तर पर है. प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन हो रहा है. पहाड़ के पहाड़ इंसानों ने काट कर मैदान बना दिये वन्य जीवों और वनस्पतियों की सैंकड़ों प्रजातियां नष्ट हो गई, जिसकी वजह से प्रकृति का संतुलन बिगड़ रहा है और उसी की बदौलत यह ग्लोबल वार्मिंग की स्थिति उत्पन्न हुई है. ग्लोबल वार्मिंग और क्लाइमेट चेंज को अगर हमने चेलेंज के रूप में नहीं लिया तो इसके नतीजे हमें छठे महाविनाश के मुहाने पर ला खड़ा करेंगे जो मानव जाति और पृथ्वी के लिए बड़ा चैलेंज होगा.

ग्लोबल वार्मिंग और ग्लोबल कूलिंग दोनों ही अवश्यम्भावी है और लेकिन इंसान की लापरवाही इन्हें समय से पहले आने का न्योता दे रही है, जो मानव जीवन और मानव सभ्यता दोनों के लिए घातक है. सभी विकसित और विकासशील देशों को एकजुट होकर पृथ्वी पर जीवन को सुरक्षित और सुखमय बनाने के लिए कार्बन उत्सर्जन में कटौती करने के लिए प्रतिबद्धता के साथ कार्य योजना तैयार करने की आवश्यकता है ताकि प्रदूषित हो रहे पर्यावरण को नुकसान होने से बचाया जा सके.