भीलवाड़ा में परिजनों की हैवानियत, बुखार से तप रहे 1 साल की मासूम को गर्म सलाखों से दागा...

बुखार से तप रहे मासूम को अन्धविश्वासी परिजन अस्पताल ले जाने की बजाय खुद ही ने जब गर्म सलाखों से बच्चे को दागा, तो बच्चा और जोर से रोने लगा.

भीलवाड़ा में परिजनों की हैवानियत, बुखार से तप रहे 1 साल की मासूम को गर्म सलाखों से दागा...
उसकी हालत बिगड़ी तो परिजन उसे लेकर अस्पताल लेकर पहुंचे.

भीलवाड़ा: जिले में बीमार मासूम बच्चों की जिंदगी से खिलवाड़ करने का खेल रूकने का नाम ही नहीं ले रहा है. दर्जनों मामले सामने आने के बाद शनिवार को एक बार फिर मासूम की जान खतरे में पड़ गई. बुखार से तप रहे मासूम को अन्धविश्वासी परिजन अस्पताल ले जाने की बजाय जब गर्म सलाखों से बच्चे को दागा, तो बच्चा और जोर से रोने लगा. उसकी हालत बिगड़ी तो परिजन उसे लेकर अस्पताल लेकर पहुंचे.

जानकारी के अनुसार, कारोई थाना क्षेत्र के गाडरमाला का लालाराम बागरिया झाड़ू बेचकर परिवार का पालन-पोषण करता है. करीब एक माह पहले लालाराम पत्नी रतनी व एक साल की बच्ची सुमन को लेकर पंजाब क्षेत्र में झाड़ू बेचने गया था. वहां, सुमन की तबीयत खराब हो गई. उसे श्वास लेने में दिक्कत आने लगी. इस पर मां रतनी ने खुद ही बच्ची के डाम लगा दिया. 

रतनी देवी ने बताया कि यह परंपरा उनके परिवार में पुराने समय से चली आ रही है. वह स्वयं बीमार हुई तो उसे भी डाम लगाया गया, जिससे वह सही हो गई. इसके अलावा रतनी की मां भी बीमार होने पर डाम लगाकर खुद का उपचार करती थी. उसी परंपरा का अनुसरण करते हुए उसने भी सुमन को ठीक करने के उद्देश्य से डाम लगा दिया, लेकिन उसे मालूम नहीं था कि ऐसा करने से उसकी हालत और बिगड़ जाएगी. पंजाब से लौटने के बाद भी बच्ची सही नहीं हुई तो उसे भीलवाड़ा के महात्मा गांधी अस्पताल में भर्ती करवाया गया है.

महात्मा गांधी अस्पताल के पीएमओ डॉ. अरूण गौड़ ने बताया कि बच्ची की हालत सामान्य है और उसे डॉक्टरों की निगरानी में रखा गया है. डॉ. गौड़ ने कहा कि डाम लगाने के इस अंधविश्वास के खिलाफ सबको मिलकर प्रयास करने की जरूरत है, जिससे कि मासूम अंधविश्वास का शिकार न हों. उन्हें समय पर चिकित्सा सुविधा उपलब्ध हो सके. 

उन्होंने बताया की किशोर न्याय अधिनियम 15 के तहत बच्चों पर इस तरह की क्रूरता प्रदर्शित करने पर कार्रवाई का प्रावधान है. इसमें तीन साल की सजा और एक लाख जुर्माना हो सकता है. यह परिजनों की नासमझी की वजह से होता है तथा डांव लगाने वाले भी गांव में उपलब्ध होते हैं. इस कारण यह कानून लाया गया है. फिलहाल, कोई विशेष कार्रवाइयां कानून में नहीं हो आई है. बीमारी से ग्रस्त मासूम को दागना जानलेवा हो सकता है. निमोनिया ही नियंत्रण नहीं रहने से जान ले सकता है और ऐसे में उपचार करवाकर बच्चे को दागने से सेप्टीसिमिया और तार आदि से दागने पर टिटनेस जैसे जानलेवा संक्रमण का भी खतरा बढ़ जाता है. 

भीलवाड़ा, चित्तौड़, राजसमंद और पड़ोसी जिले में सर्दी के मौसम में निमोनिया की शिकायत और अंधविश्वास के चलते मासूमो को दागने की घटनाएं तेजी से सामने आती है. आधा दर्जन से अधिक बच्चे इस गर्म सलाखों की भेंट चढ़ चुके है, लेकिन इस कुप्रथा को रोकने के दावे करने वाला प्रशासन और सामाजिक संघटन धरातल पर कुछ नहीं कर पा रहे. इसी के कारण दिनों दिन इस तरह की घटनाओं में इजाफा हो रहा है.