जयपुर: निकाय चुनाव में चेयरमैन की कुर्सी के लिए करोड़ों का खर्च, किसके नाम कटेगा बिल?

चेयरमैन की कुर्सी ऐसी है कि पालिका, परिषद और निगम में मुखिया बनने के लिए नेता कुछ भी करने को तैयार हैं.  

जयपुर: निकाय चुनाव में चेयरमैन की कुर्सी के लिए करोड़ों का खर्च, किसके नाम कटेगा बिल?
जानकारी के अनुसार, पार्षदों की बाड़ेबंदी हो रही है.

जयपुर: निकाय चुनाव के नतीजों के बाद चेयरमैन की कुर्सी के लिए मशक्कत चल रही है. असल में इस कुर्सी पर बैठने के लिए तरह-तरह की कवायदें चल रही हैं. दरअसल यह सारी कवायद उन निकायों में ज्यादा हो रही है, जहां पर किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है.

जानकारी के अनुसार, पार्षदों की बाड़ेबंदी हो रही है. इतना ही नहीं, रेट भी तय हो रहा है लेकिन सबसे बड़ा सवाल कि आखिर इस सारे खर्चे का बिल किसके नाम कटेगा?

माना पैसा खुदा नहीं है पर खुदा की कसम खुदा से कम भी नहीं है
पैसे को लेकर कही गई इन चंद लाइनों से पैसे की अहमियत अपने आप ज़ाहिर हो जाती है. चेयरमैन बनने की जद्दोजहद में इसे देखा जा सकता है. चेयरमैन की कुर्सी ऐसी है कि पालिका, परिषद और निगम में मुखिया बनने के लिए नेता कुछ भी करने को तैयार हैं.

कुछ समय पहले लोकसभा चुनाव लड़ चुके एक नेताजी भी निकाय के मुखिया बनना चाहते हैं. इसके लिए वे भी पैसे की जुगत लगा रहे हैं. हालत ये हैं कि जयपुर के त्रिवेणी नगर में इन नेताजी का एक बड़ा प्लॉट है और नेताजी ने इस प्लॉट की बिकवाली निकाल दी है. एक अनुमान के मुताबिक, इस प्लॉट की बिक्री से उनके पास तकरीबन चालीस करोड़ रुपये आएंगे., जिसमें से कुछ रकम कथित तौर पर पार्षदों का वोट खरीदने के लिए दी जाएगी. 

बिल के सवाल पर खामोश हो जाते हैं नेता
चेयरमैन के लिए चुनाव 26 नवंबर को होना है लेकिन तब तक अपने खेमे के पार्षदों को सुरक्षित जगह पर रखना और उन्हें टूटने से बचाने का बड़ा ज़िम्मा भी नेताओं के कंधों पर है. लिहाजा 26 के चुनाव तक पार्षदों को अच्छे होटल में रुकवाया जा रहा है. खातिरदारी की जा रही है. ऊपर से वोट के साथ जुहारी दी जाएगी सो अलग. अलबत्ता इतना खर्चा तो हो रहा है लेकिन इसका बिल किसके नाम कटेगा, इस सवाल पर कांग्रेस नेता खामोश हैं.

यही सवाल बीजेपी के प्रदेशाध्यक्ष सतीश पूनिया से हुआ तो उन्होंने कहा कि पार्टी के पार्षदों में कोई सेंधमारी नहीं कर सके, इसलिए सभी पार्षदों को एक जगह ठहराने को कहा गया है. उन्होंने कहा कि इसकी ज़िम्मेदारी पार्टी और उसके नेताओं की होती है. बीजेपी ने तो नेताओं को ज़िम्मेदारी दे दी और नेता भी पार्षदों की सहूलियत का पूरा ध्यान रख रहे हैं. सतीश पूनियां ने कहा कि सांसद, विधायक, चेयरमैन, ज़िलाध्यक्ष और समन्वयक को इस बारे में व्यवस्था करनी होती है. पूनिया ने सीधे तौर पर किसी एक के मत्थे यह पूरा खर्चा नहीं मढ़ने की बात कही. 

होता है काफी खर्चा
पार्षदों के ठहरने-खाने और उनकी सुविधाओं पर होने वाले खर्च के साथ ही चेयरमैन की कुर्सी के लिए बहुमत का आंकड़ा जुटाने में भी कई बार प्रत्याशी को खर्चा करना होता है. ऐसे में पार्षदों को किए जाने वाले कथित भुगतान का खर्चा भी इसमें जुड़ता है. निकाय चुनाव के नतीजे आने से पहले चेयरमैन के दावेदारों के नाम यह खर्चा था लेकिन कई जगह से प्रत्याशी के पार्षद चुनाव में ही हार जाने के बाद उसका नाम खर्चे वाली लिस्ट से काट दिया गया है.

बाड़ेबंदी से बाहर आने वाले ऐसे ही पार्षद अब राहत की सांस लेते हुए कह रहे हैं कि अच्छा हुआ जो चुनाव हार गए वरना पूरे खर्चे में इंवेस्टमेंट इतना था कि उसका रिटर्न वापस लेने और कर्जदारों का पैसा चुकाने में भी पसीने आ जाते.