बारां: खत्म हो रही लोक कलाएं, दो वक्त की रोटी तक नहीं जुटा पा रहे कलाकार

कभी लोक कलाकार गांवों में घूम-घूम कर लोक देवताओं के भजन देशी वादन की धुन पर सुनाते थे और गांव में लोग दान दक्षिणा देते थे.

बारां: खत्म हो रही लोक कलाएं, दो वक्त की रोटी तक नहीं जुटा पा रहे कलाकार
गांवों में कई प्रकार की कलाएं देखी जाती थी पर आज वह सब लुप्त हो चुकी हैं.

राम मेहता, बारां: जिले में लोक कला समय के अनुसार लुप्त होती जा रही है. डिजिटल के युग में लोक कलाकारों को रोजी-रोटी कमाना मुश्किल हो रहा है. 

गांवों की लोक कलाएं और लोक कलाकार समय के अनुसार लुप्त होते नजर आ रहे हैं. कभी लोक कलाकार गांवों में घूम-घूम कर लोक देवताओं के भजन देशी वादन की धुन पर सुनाते थे और गांव में लोग दान दक्षिणा देते थे. इससे इन कलाकारों के परिवार चलते थे लेकिन अब समय के अनुसार कलाकार भी कम हुए हैं तो इन कलाओं को परखने वालों में भी कमी आई है.

गांवों में कई प्रकार की कलाएं देखी जाती थी पर आज वह सब लुप्त हो चुकी हैं. अब जो बची-खुची हैं, वह आखिरी पड़ाव पर पहुंच चुकी हैं. गांवों में पहले के समय जब कोई मनोरंजन के साधन नहीं थे, उस समय लोक कलाओं द्वारा ही अपना समय पास करते थे.

ज्यादातर पहले के समय कालबेलिया भोपा नायक नठ आदि अपनी कलाओं का प्रदर्शन करके अपनी रोजी-रोटी कमाकर परिवार का पालन-पोषण करते थे पर समय के अनुसार सब लुप्त होने के कगार पर हैं. कभी-कभार राऊंटा (शारंगी) वाले भोपा (नायक) समाज के लोग गांवों में देखने को मिलते हैं.