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राजस्थान में पर्यावरण के लिए 22 दिनों से प्रचंड गर्मी में अग्नि तपस्या कर रहे यह बाबा

रामनाथ जी महाराज की है तपस्या 19 मई को शुरू हुई जो कि 29 जून को खत्म होगी. यह तपस्या पूरे 41 दिनों तक चलेगी.

राजस्थान में पर्यावरण के लिए 22 दिनों से प्रचंड गर्मी में अग्नि तपस्या कर रहे यह बाबा
इस दौरान मठ में श्रद्धालु हरि कीर्तन करते रहते हैं.

सरदारशहर: मरुभूमि सदा से संतों महात्माओं की कर्म स्थली रही है. यहां पर संतों महात्माओं ने अपनी तपस्या के दम पर पूरे विश्व भर में अपने तेज से सभी को अपनी ओर आकर्षित किया है. संतो ने यहां जगत कल्याण के लिए ऐसी ऐसी तपस्या की है जिससे बाबाओं के प्रति लोगों की आस्था बढ़ी है. चुरू जिले में इस समय प्रचंड गर्मी पड़ रही है, जिसके चलते आदमी 1 मिनट भी खड़ा नहीं रह सकता.गर्मी का प्रकोप ऐसा है मानो सूर्य देवता अग्नि वर्षा कर रहे हो. चूरु में पारा 50 डिग्री पार कर चुका है. जिसके चलते बड़े बड़े चैनलों की हेडलाइंस इस समय चूरू बना हुआ है. ऐसे में चुरू जिले के सरदारशहर तहसील से 35 किलो दूर गांव पातलीसर में जगत कल्याण के लिए और पर्यावरण बचाने के लिए धोरों के बीच बने मठ में पिछले 22 दिनों से रामनाथ जी महाराज आग की नो धुनियों के बीच तपती धूप में अग्नि तपस्या कर रहे हैं. 

19 मई को शुरू हुइ तपस्या
रामनाथ जी महाराज की है तपस्या 19 मई को शुरू हुई जो कि 29 जून को खत्म होगी. यह तपस्या पूरे 41 दिनों तक चलेगी. 41 दिन किस तपस्या में नौ आग की ढेरियों की धूनी के बीच सुबह 12 बजे से दोपहर 2 बजे तक रोजाना रामनाथ जी महाराज तप करते हैं. इस दौरान मठ में श्रद्धालु हरि कीर्तन करते रहते हैं. बाबा की तपस्या समाप्त होने के बाद श्रद्धालु बाबा से प्रसाद लेकर ही जाते हैं.

9 कंडो की धूनी लगाकर शुरू हुई अग्नि तपस्या
पर्यावरण बचाने और जगत कल्याण के लिए बाबा ने कंडो (थेपडियां) की 9 धूनी अलग-अलग जलाकर अग्नि तक शुरू किया है. 31 कंडो थेपडियां की धूनी लगाकर शुरू किया गया तप मैं हर दिन एक कंडो अधिक रख दी जाती है. अंत तक एक ढेरी पर करीब 70 कंडो थेपडियां लगाकर विशाल धुना रमाया जायेगा. तपस्या के अंतिम दिन यहां बड़ा भंडारा लगेगा जिसमें दूर-दराज से श्रद्धालु आकर भंडारे का प्रसाद ग्रहण करेंगे. रेतीले धोरो के बीच बना है मठ जगन्नाथ महाराज का यह मठ रेतीले धोरों के टीले पर बना है. जहां चारों और रेतीले धोरे ही दौरे नजर आते हैं. कहते हैं किसी जमाने में यहां पर जगन्नाथ महाराज ने कठिन तपस्या की थी और उनकी तपस्या का प्रभाव भी पूरे क्षेत्र पर था उसी जगह आज रामनाथ जी महाराज तपस्या कर रहे हैं.

यहां दूर-दूर आते हैं श्रद्धालु रामनाथ जी महाराज की अग्नि तपस्या को देखने के लिए आते हैं. जब तक तपस्या चलती है तब तक हरि कीर्तन और भजन कार्यक्रम चलता रहता है. लोग यहां आकर भगवान के ध्यान में एसे मग्न होते हैं कि मानो साक्षात भगवान को प्राप्त कर लिया हो यहां महिलाएं और पुरुष दोनों ही बड़ी तादाद में आते हैं.

पिछले वर्ष भी की थी तपस्या ग्रामीणों ने बताया कि पिछले वर्ष भी बाबा ने 41 दिन की प्रचंड गर्मी के बीच अग्नि तपस्या की थी, जिसके चलते गांव में अच्छी फसल हुई और गांव में सुख समृद्धि रही. इसी के चलते ग्रामीणों की श्रद्धा बाबा के प्रति और बढ़ गई बाबा की पूरी देखभाल ग्रामीण ही करते हैं. तपस्या के दौरान बाबा नहीं करते अन्न ग्रहण, 41 दिन की कठिन तपस्या में रामनाथ जी महाराज किसी प्रकार का कोई अन ग्रहण नहीं करते हैं बाबा केवल एक गिलास दही पीकर ही गुजारा कर रहे हैं.

राम नाथ जी महाराज का मानना है कि पर्यावरण और जनकल्याण के लिए ही संतों का जीवन समर्पित होता है. संत की अपनी कोई जाति नहीं होती. संत औरों के लिए जीता है और औरों के कल्याण के लिए ही मरता है. तपस्या भारतीय संस्कृति की संजीवनी है. इतिहास गवाह है हमारे ऋषि मुनियों ने तपस्या के बल पर हर असंभव कार्य पूर्ण किए हैं. साधना और तपस्या से प्रभु की प्राप्ति सहज ही हो जाती है. तपस्या आत्म कल्याण का सर्वोत्तम साधन है. वाकई में जहां एक और चूरू में इस समय पारा अपने चरम सीमा पर है और इस गर्मी में बाहर निकलने से पहले 10 बार सोचना पड़ता है वहीं बाबा की यह तपस्या मानो चीख चीख कर कह रही है की संतों और महात्माओं के तब के आगे सूरज का तेज भी फीका पड़ जाता है.