जयपुर: कुंभलगढ़ में बनेगा प्रदेश का चौथा टाइगर रिजर्व, CM गहलोत की मुहर लगनी बाकी

मुख्यमंत्री के साथ स्टेट वाइल्डलाइफ बोर्ड की बैठक में बोर्ड सदस्य धीरेंद्र गोधा ने कुंभलगढ़ को जल्द से जल्द टाइगर रिजर्व बनाए जाने की पैरवी की.

जयपुर: कुंभलगढ़ में बनेगा प्रदेश का चौथा टाइगर रिजर्व, CM गहलोत की मुहर लगनी बाकी
कुंभलगढ़ में बनेगा प्रदेश का चौथा टाइगर रिजर्व. (प्रतीकात्मक तस्वीर)

दामोदर प्रसाद/जयपुर: मुख्यमंत्री के साथ स्टेट वाइल्डलाइफ बोर्ड की बैठक में बोर्ड सदस्य धीरेंद्र गोधा ने कुंभलगढ़ को जल्द से जल्द टाइगर रिजर्व बनाए जाने की पैरवी की. पूर्व में रिटायर्ड सीसीएफ राहुल भटनागर ने जयपुर में इसके लिए उच्च अधिकारियों को प्रेजेंटेशन दे चुके हैं. विधानसभा अध्यक्ष डॉ.सीपी जोशी ने भी मुख्यमंत्री अशोक गहलोत (Ashok Gehlot) को पत्र लिख चुके हैं.

वहीं, राजसमंद सांसद एवं एनटीसीए की सदस्या दिया कुमारी भी कुंभलगढ़ को टाइगर रिजर्व बनाए जाने के लिए कह चुकी हैं, तो राज्यसभा सांसद एवं एनटीसीए सदस्य महाराज हर्षवर्धन सिंह डूंगरपुर-कुंभलगढ़ को टाइगर रिजर्व बनाए जाने के लिए राष्ट्रीय बाघ प्राधिकरण को पत्र लिख चुके हैं. वन्यजीव संरक्षण कर्ता अनिल रोजर्स कुंभलगढ़ स्टाफ को टाइगर रीइंट्रोडक्शन एवं ह्यूमन वाइल्डलाइफ कनफ्लिक्ट एंड को एक्सिटांस पर ट्रेंनिंग दे चुके हैं. साथ ही राजसमंद डीएफओ फतेह सिंह राठौड़ द्वारा ग्रासलैंड एवं प्रेबेस मैनजमेंट पर कार्य किया जा रहा है.

दरअसल, कुंभलगढ़ में कंजेर्वशन ब्रीडिंग प्रोग्राम के लिए एनक्लोजर भी लगभग बन के तैयार हो चुका है. यहां के जंगल 70 के दशक तक बाघों से आबाद थे. प्रदेश में कुंभलगढ़ एक मात्र ऐसा बड़ा जंगल बचा है जिसे टाइगर रिजर्व बनाया जा सकता हैं. यहां टाइगर को बसाने के लिए उपयुक्त कंडीशन्स हैं.

फिलहाल प्रस्तवित कुंभलगढ़ टाइगर रिजर्व में 383.286 का कोर टाइगर हैबिटैट एवं 1572.32 स्क्वायर किलोमीटर का बफर जोन है यानी लगभग 1955 स्क्वायर किलोमीटर का एरिया जो कि सरिस्का और मुकुन्दरा टाइगर रिज़र्व से भी बड़ा है. फिलहाल यहां अच्छा प्रेबेस हैं, जिसमें सांभर, चीतल, चौसिंघा, चिंकारा, नीलगाय जंगली सुअर, हनुमान लंगूर, सेही से लेकर जंगली खरगोश एवं जंगली मुर्गों व मोरों की अच्छी संख्या है.

बाघ हालांकि बड़ा शिकार करना पसंद करते हैं. लेकिन मौका मिले तो छोटा शिकार करने से भी परहेज नहीं करते हैं. कुंभलगढ़ की खासियत यहां के स्लोथ बेयर यानी भालू एवं भेड़िए और पैंथर भी हैं. इसके अलावा कुछ ऐसी प्रजातियां हैं जो खास तौर पर कुंभलगढ़ के जंगलों में मिलती हैं. ग्रे जंगल फाऊल, अरावली रेड स्पर फाऊल, यहां की खासियत है तो माउंट आबू में मिलने वाली ग्रीन मुनिया भी यहां अच्छी संख्या में है.

उल्लुओं की प्रजाति में यहां इंडियन ईगल आउल, ब्राऊन फिश आउल, डस्की आउल, जंगल आउलेट,स्पॉटेड आउलेट, स्कोपस आउल की प्रजातियां हैं, तो यहां मगरमच्छ, जरख, भारतीय लोमड़ी, सियार सहित कई वन्यजीव देखे जा सकते हैं. कुंभलगढ़ का किला वर्ल्ड हेरिटेज साइट है. यहां की 35 किलोमीटर की दीवार चीन की दीवार के बाद सबसे लंबी है. 

यहां की कई शिकार ओहदियां देखने लायक है. यहां विजिट करना अपने आप में लाइफ टाइम एक्सपीरियंस है. वन्यजीव विशेषज्ञ अनिल रोजर्स नें बताया कि यहां देखने के लिए इतनी चीजें हैं कि टूरिजम का प्रेशर टाइगर पर नहीं होगा अन्य जगहों पर ज्यादातर टूरिस्ट केवल टाइगर को ही देखने जाते हैं तो कहीं टाइगर को इसीलिए बसाया जाता है कि टूरिजम डेवलप हो सके.

उन्होंने कहा कि उदयपुर, अजमेर, राजसमंद, पाली जिसमें यह प्रस्तवित टाइगर रिजर्व बनाया जाना है. ऑलरेडी टूरिजम सर्किट में है. रोजर्स नें बताया कि हमारी प्राथमिकता टाइगर सेफ्टी होगी. कुंभलगढ़ वास्तव में एक अद्भुत जंगल है, यहां टाइगर को बसाया जाता है तो मेवाड़-मारवाड़ की खोई हुई शान और विरासत पुनः लौट सकेगी.