बारां: महाराणा प्रताप का साथ देने वाले आज दर-दर की ठोकरें खाने पर मजबूर

राजस्थान के बारां जिले में आजादी के 72 साल बाद भी गाड़िया लुहारों को रहने के लिए अपना स्थायी आवास नसीब नहीं हो पाया है.  

बारां: महाराणा प्रताप का साथ देने वाले आज दर-दर की ठोकरें खाने पर मजबूर
आग में तपाकर लोहे के कृषि उपकरणों को गढ़ने वाले इन हाथों का रोजगार ही छिन गया.

राम  मेहता, बारां: राजस्थान के बारां जिले में आजादी के 72 साल बाद भी गाड़िया लोहारों को रहने के लिए अपना स्थायी आवास नसीब नहीं हो पाया है. ऐसे में गाड़िया लोहारों की चलती हुई गाड़ी ठहर जाने के कारण आज जीवन बसर करने के लिये दर-दर की ठोकरें खाने पर मजबूर होना पड़ रहा है.

गाड़िया लोहार एक ऐसा समुदाय जिसने अपनी जिंदगी मेवाड़ के राजा महाराणा प्रताप के नाम कर दी. योद्धाओं के तौर पर खुद को राणा के साथ तपाया. पग-पग पर राणा का साथ दिया. ऐसे गाड़िया लोहार जिन्होंने बैल गाड़ी पर ही पूरी जिंदगी काटने का प्रण लिया, जो आज भी अपनी उसी परंपरा को निभा रहे हैं, लेकिन बदलते समाज की चुनौतियां बदलीं, तो जिंदगी को बदलते गाड़िया लोहार भी देखना चाहते हैं. बारां के अंता में रहने वाले गाड़िया लोहारों को किसी भी तरह की सरकारी मदद नहीं मिल रही है. 

आधुनिकता और मशीनरी युग ने इनके सामने पहाड़ सी चुनौतियां खड़ी कर दी हैं. आग में तपाकर लोहे के कृषि उपकरणों को गढ़ने वाले इन हाथों का रोजगार ही छिन गया. ऐसे में अब गाड़िया लोहार एक जगह पर ठहर से गए हैं. रोजगार न मिलने से जीवन यापन करना भारी पड़ रहा है.

इनके पुनर्वास के लिए भले ही सरकार काम कर रही हों, लेकिन ये व्यवस्था भी सूबे के हर हिस्से में रहने वाले गाड़िया लोहारों के लिए नहीं दिखती. अंता कस्बे में कई वर्षों से ये लोग रह रहे हैं, आर्थिक तंगी में बच्चों को भरण पोषण करना इनके लिए मुश्किलों भरा है. इनका कहना है कि यहां रहने वाले गाड़िया लोहारों के साथ सौतेला व्यवहार किया जा रहा है.

महाराणा प्रताप की सेना के लिए घोड़ों की नाल, तलवार और अन्य हथियार बनाने और आधुनिक इतिहास में अपने हाथों से कृषि उपकरणों को गढ़ने वाले ये गाड़िया लोहार आज दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं. उम्मीद करते हैं कि सिस्टम इनकी सुध जल्द ही लेगा.