भंवाल माता मंदिर: राजस्थान के इस मंदिर में मां को लगता है 'ढाई प्याले शराब' का भोग

नवरात्र के दिनों में मंदिर में मेले सा माहौल नजर आता है. भारत के साथ साथ विदेश से आए सैलानियों में भी यह मंदिर मशहूर है. 

भंवाल माता मंदिर: राजस्थान के इस मंदिर में मां को लगता है 'ढाई प्याले शराब' का भोग
लोग दूर-दूर से माता के दरबार में मन्नत मांगने आते हैं.

हनुमान तंवर, नागौर: जिले के ऐतिहासिक भंवाल माता मंदिर में इन दिनों हर समय भक्तों का भारी जमावड़ा लगने लगा है. लोग दूर-दूर से माता के दरबार में मन्नत मांगने आते हैं लेकिन इस बार कोविड-19 की वजह से भक्तों में थोड़ा सा डर है लेकिन आस्था है कि श्रद्धालुओं को यहां खींच कर ले आती है.

नवरात्र के दिनों में मंदिर में मेले सा माहौल नजर आता है. भारत के साथ साथ विदेश से आए सैलानियों में भी यह मंदिर मशहूर है. काली माता के इस मंदिर की विशेषता यह है कि यहां माता को भक्तों द्वारा शराब का भोग लगाया जाता है. माता एक भक्त से ढाई प्याला शराब का भोग लगाती है. खास बात ये है कि माता उसी भक्त की शराब का भोग स्वीकार करती हैं, जिसकी मनोकामना या मन्नत पूरी होनी होती है. नवरात्र में लोग विशेष तौर पर इस मंदिर में आते हैं.

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ऱाजस्थान के नागौर जिले की मेड़ता तहसील के भंवाल गांव में काली माता का मंदिर है, जिसके निर्माण को 800 से ज्यादा साल हो चुके हैं बाकी सब जगहों से हटकर भंवाल गांव के काली माता मंदिर की खास बात ये है कि यहां पर काली माता को भक्त प्रसाद के रूप में शराब का भोग लगाते हैं. खास बात यह है कि माता भी सभी भक्तों की शराब स्वीकार नहीं करतीं. केवल उसी भक्त की शराब कबूल की जाती है, जिसकी मन्नत पूरी की जानी होती है. नवरात्र के मौके पर भक्त विशेष तौर पर अपनी फरियाद लेकर माता के दरबार में आते हैं औऱ भारी तादाद में इन दिनों माता के भक्त मंदिर में देखे जा रहे हैं.

माता की दो हैं यहां मूर्तियां
मंदिर में दो माता की मूर्तियां हैं- पहली बह्माणी माता, जिन्हें मीठा प्रसाद चढ़ाते हैं, दूसरी काली माता की, जिनको शराब चढ़ाई जाती है. हजारों भक्त  भंवाल में अपनी मुरादें लेकर आते हैं. ऐसा नहीं है कि भक्त सिर्फ मन्नत मांगने के लिए ही माता के दरबार में आते हैं बल्कि जिन भक्तों की मुराद पूरी हो जाती है, वे भी फिर से माता का शुकराना अदा करने भंवाल आते हैं.

चमड़े से बनी चीजों का होता है यहां परहेज
मंदिर में भक्तों को इस बात का भी खास ध्यान रखना होता है कि वो चमड़े से बनी कोई चीज इस वक्त न पहने हों. खासकर तब, जब इसकी शराब को भोग लगाया जा रहा हो. अगर भक्त चमड़े से बनी कोई चीज पहने होता है तो माता उसकी भेट स्वीकार नहीं करती. पुजारी जब शराब का प्याला माता को चढ़ाता है. अगर माता को भक्त की शराब मंजूर हो तो शराब का प्याला खाली हो जाता है, इस तरह करके माता ढाई प्याला शराब ग्रहण करती हैं. 

भारत आस्था प्रधान देश है. यहां आस्था पहले होती है औऱ विज्ञान बाद में भंवाल माता के प्रति भक्तों की आस्था भी कुछ ऐसी ही है. जिस शराब को आमतौर पर समाज मे अच्छा नहीं माना जाता, वही शराब यहां पवित्र मानी जाती है और हर उम्र के भक्तों के हाथ में देखी जा सकती है.