सरकार को हुआ साल, विकास के लिए विवेकानुदान फंड का कब होगा इस्तेमाल ?

विकास के नाम पर वोट लेने वाले मंत्री विवेकानुदान फंड का अभी तक एक रुपया भी खर्च नहीं कर पाए है. जबकि गहलोत सरकार अपने कार्यकाल का एक साल पूरा करने जा रही है. 

सरकार को हुआ साल, विकास के लिए विवेकानुदान फंड का कब होगा इस्तेमाल ?
फंड का इस्तेमाल नहीं कर पा रहे है गहलोत के मंत्री

भरत राज,जयपुर : किसी भी सरकार की कामयाबी उसके द्वारा किए गए विकास कार्य को लेकर आंकी जाती है सरकार जब तक सत्ता में रहती है तो जनता उम्मीद करती है कि वो उसके लिए विकास के रास्ते खोले और इन्ही विकास के काम पर वो सरकार को वोट देती है ये एक आम अवधारणा है.चुनाव के दौरान आपने मंत्रियों को अक्सर ये कहते सुना होगा कि क्षेत्र में विकास होगा, गरीबों की किस्मत बदल जाएगी, सड़के पक्की हो जाएंगी, नालियां साफ हो जाएंगी, शहर हो या गांव हर जगह विकास की गंगा बहेगी. इन लोकलुभावन वादो के दम पर वो जीत भी जाते है लेकिन जब सत्ता में आकर कुर्सी पर विराजमान हो जाते है तब जाकर जनता के सामने उनकी असलियत से पर्दा उठता है.
राजस्थान में इन दिनों विकास ना होने को लेकर आवाजें उठ रही है और मुद्दा बना है विवेकानुदान.जब कैबिनेट मंत्रियों और संसदीय सचिवों को मिलने वाले विवेकानुदान कोष की आज एक ऐसी हकीकत आपके सामने आने वाली है जिसे देखकर आप सन्न रह जाएंगे. जी मीडिया की पड़ताल में जो खुलासा हुआ है उससे सामने आया है कि जनता की मदद की बात करने वाले मंत्री विवेकानुदान फंड का अभी तक एक रुपया भी खर्च नहीं कर पाए है. जबकि गहलोत सरकार अपने कार्यकाल का एक साल पूरा करने जा रही है. 
चलिए पहले तो ये समझ लेते हैं कि आखिर विवेकानुदान या वैवेकिक फंड क्या है. 1959 सरकार ये फंड देती आ रही है. जिसमें सीएम, कैबिनेट मंत्री, संसदीय सचिव अपने क्षेत्र या किसी दूसरी जगह जरूरतमंद की मदद के लिए अपने फंड से पैसा जारी कर सकते हैं. माना जाता है कि कैबिनेट मंत्री, संसदीय सचिव जनता के बीच में रहते हैं. जगह-जगह जनसुनवाई समेत क्षेत्र में दौरे के समय उन्हें जरूरतमंद मिलते हैं. ऐसे में मंत्री उनसे मुंह मोड़कर नहीं जा सकते. और उन्हें अपने फंड से पैसा देते हैं.
कौन कितना फंड खर्च कर सकता हैं ?
मुख्यमंत्री - 50 लाख रुपये सालाना
कैबिनेट मंत्री- 2 लाख रुपये सालाना
संसदीय सचिव- 1 लाख रुपये सालाना
प्रति व्यक्ति अधिकतम- 1 हजार रुपये
गहलोत सरकार में 25 मंत्री हैं.वहीं सरकार ने अभी तक संसदीय सचिव नहीं बनाए हैं. इसलिए मंत्री ही अपने विवेकानुदान कोष का इस्तेमाल कर सकते थे. लेकिन अभी तक एक भी मंत्री ने अपने विवेकानुदान कोष का इस्तेमाल नहीं किया है. जबकि कई मंत्री यह कहते नज़र आते हैं कि उनके पास बजट नहीं है.
प्रदेश में हैं कुल 25 मंत्री है. सीएम समेत 15 कैबिनेट मंत्री शामिल. जिनमें  डिप्टी सीएम सचिन पायलट, बीडी कल्ला, शांति धारीवाल, परसादी लाल, भंवरलाल मेघवाल, लालचंद कटारिया, रघु शर्मा, प्रमोद भाया, विश्वेंद्र सिंह, हरीश चौधरी, रमेश चंद मीणा, उदयलाल आंजना, प्रताप सिंह खाचरियावास, शाले मोहम्मद शामिल है इसके अलावा राज्यमंत्रियों की संख्या 10 है .जिनमें गोविंद सिंह डोटासरा, ममता भूपेश, अर्जुन बामनिया, भंवर सिंह भाटी, सुखराम विश्नोई, अशोक चांदना, टीकाराम जूली, भजनलाल जाटव, राजेंद्र सिंह यादव, सुभाष गर्ग शामिल है.   
पिछली सरकार की बात की जाए तो बीजेपी सरकार के आखिरी साल में भी कुछ मंत्रियों ने ही विवेकानुदान कोष का इस्तेमाल किया था. जिन्होंने काम में लिया वो भी विवेकानुदान कोष को पूरा खर्च नहीं कर पाए थे.गुलाबचंद कटारिया,अरुण चतुर्वेदी,किरण माहेश्वरी,राजेंद्र राठौड़,कृष्णेंद्र कौर दीपा और अनिता भदेल पिछली सरकार के वो नाम है जिन्होने आखिरी साल में रुचि दिखाई थी.
हैरानी इस बात की है कि बीजेपी सरकार में विवेकानुदान कोष का उपयोग नहीं करने पर कांग्रेस नेता प्रताप सिंह खाचरियावास ने सवाल उठाया था. खाचरियावास ने कहा था कि जनता परेशान है. लेकिन मंत्रियों को इनकी पीड़ा से कोई सरोकार नहीं है. इनका विवेक खत्म हो गया है. और इन्हें मंत्री पद पर बने रहने का कोई अधिकार नहीं है. विवेकानुदान कोष का उपयोग नहीं करने पर निशाना साधने वाले खाचरियावास आज कैबिनेट मंत्री हैं. लेकिन वो खुद कोष का उपयोग करना शायद भूल गए हैं.