टंगस्टन का खान होने के बाद भी रेवत की पहाड़ियों की हो रही अनदेखी, सरकार बेफिक्र

सरकारी तंत्र की उपेक्षा के चलते अथाह खनिज भंडार को अपने में समेटे रेवत की पहाड़ी आज भी उपेक्षित है.

टंगस्टन का खान होने के बाद भी रेवत की पहाड़ियों की हो रही अनदेखी, सरकार बेफिक्र
आज भी भारत को इजराइल एवं चीन से टंगस्टन को आयात करना पड़ता है.

मनोज सोनी/नागौर: प्रदेश के नागौर जिले के ड़ेगाना में पूरे देश की एक मात्र टंगस्टन की रेवत पहाड़ी अपना दुर्लभ इतिहास समेटे बेठी है. कभी प्रथम विश्व युद्ध में यहां की पहाड़ी से निकलने वाले टंगस्टन ने देश के साथ साथ ड़ेगाना का मान जरूर बढ़ाया हो लेकिन सरकारी तंत्र की उपेक्षा के चलते अथाह खनिज भंडार को अपने में समेटे रेवत की पहाड़ी आज भी उपेक्षित है.

करीब बीस साल पहले बंद हुई रेवत की पहाड़ी से खनन के कार्यों को लेकर भले ही हिन्दुस्तान जिंक कोई टंगस्टन निकालने में कोई विशेष योजना ना बना पाया हो फिर भी अगर खान मंत्रालय इस पहाड़ी पर प्रभावी कार्ययोजना को अंजाम दे तो निसंकोच अपना देश भारत टंगस्टन के मामले में भी आत्मनिर्भर हो जाएगा. प्रति वर्ष अरबों रुपयों का आयात होने वाला टंगस्टन इसी देश में निकाला जा सकेगा.  

नागौर जिले के ठीक मध्य भूभाग में स्तिथ ड़ेगाना रेलवे स्टेशन के समीप रेवत गांव की रेवत पहाड़ी ऐसे तो दिखने में सामान्य पहाड़ी लगती है. पहाड़ी के एक दम शीर्ष पर स्थानीय लोक देवता रेवत जी महाराज का मंदिर भी है जिसके कारण इस पहाड़ी को रेवत की पहाड़ी कहा जाता है. स्थानीए लोगों की मानें तो जब वर्ष 1913 में अंग्रेजों का गांवो की तरफ आए तो अंग्रेजों की नजर इस रेवत की पहाड़ी पर पड़ी. 

जिसके बाद अंग्रेजी हुकूमत ने रेवत की इस पहाड़ी का महत्व समझा और अंग्रेजी भू वैज्ञानिको ने अपना डेरा रेवत की पहाड़ी पर डाल दिया. काफी प्रयास एवं सर्वे करने के बाद अंग्रेज वेज्ञानिको ने यहां आखिरकार कीमती एवं दुर्लभ धातु टंगस्टन की खोज कर डाली. इसके बाद अगले ही उन्होने साल 1914 में रेवत की इस पहाड़ी से टंगस्टन का खंनन कार्य शुरू कर दिया गया.

यही नहीं बल्कि अंग्रेजों को यहां सिर्फ टंगस्टन ही है बल्कि इस पहाड़ी पर टंगस्टन के अलावा अभ्रक, थोरियम,एवं अति दुर्लभ धातु यूरेनियम के होने के भी संकेत मिले. देश आजाद होने तक अंग्रेजी हुकूमत ने इस पहाड़ी पर अपना खनन कार्य जारी रखा. वहीं देश की आज़ादी के बाद भारत सरकार ने रेवत की पहाड़ी को अपने क्षेत्राधिकार में ले लिया और भारत सरकार का हिंदुस्तान ज़िंक लिमिटेड इस पहाड़ी पर खनन करता रहा.

धीरे-धीरे इस पहाड़ी पर टंगस्टन की प्रचुर उपलब्धता से ड़ेगाना एवं इसके आस पास के करीब 1500 लोगों को रोजगार भी मिलने लगा. टंगस्टन की उपलब्धता एवं अन्य  खनिज धातु को देखते हुए केंद्रीय इस्पात मंत्रालय ने भी रेवत की इस पहाड़ी का सर्वे कराया. जिसमें टंगस्टन धातु की प्रचुरता के साथ साथ दूसरे दुर्लभ धातु यानी यूरेनियम एवं थोरीयम होने के भी संकेत मिले थे. जिसके बाद इस पहाड़ी पर हिंदुस्तान ज़िंक की पूरी यूनिट स्थापित हो गई और प्रदेश के लोगों को आत्मनिर्भरता की  की उम्मीद जगने लगी. 

लेकिन दुर्भाग्य से हिंदुस्तान ज़िंक ने रेवत की इस पहाड़ी पर टंगस्टन का खनन नहीं कर टंगस्टन के मलबे का दोहन करने में जुट गई. तकनीकी कारणों के चलते रेवत की पहाड़ी का दोहन लागत पूंजी एवं श्रम से कई गुना महंगा पड़ने लगा जिसके बाद भारत सरकार ने टंगस्टन खनन के इस प्रोजेक्ट को बंद कर दिया. बता दें कि आज भी भारत को इजराइल एवं चीन से टंगस्टन को आयात करना पड़ता है.

वहीं रेवत की पहाड़ी से खनन कार्य रूक जाने से सैंकडो ग्रामीणों के सामने रोजी रोटी का भी संकट गहराने लगा. सर्वे के मुताबिक करीब 5.8 मीलियन का टंगस्टन अपने में समाए इस पहाड़ी पर टंगस्टन के खनन का कार्य शुरू कराए जाने की मांग को लेकर स्थानीय ग्रामीण देश की सरकार से आस लगाए बैठे है. यहां तक की स्थानीए लोगों ने अपने अपने जनप्रतिनिधियों के माध्यम से विधानसभा और लोकसभा में भी रेवत की पहाड़ी पर खनन शुरू कराए जाने की बात को रखा लेकिन सरकार ने इस मुद्दे पर अबतक कोई कदम नहीं उठाया है.